मुंबई के सबसे पुराने और विशाल वाचनालयों में से एक, एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ मुंबई का पुस्तकालय, वर्ल्ड बुक डे पर सदियों से संजोकर रखे गए अपने दुर्लभ पुस्तकों के संग्रह को आम लोगों के लिए सुलभ बनाने की कोशिशों में जुटा है। पुस्तकालय अब केवल किताबें उधार लेने की जगह से बढ़कर, साहित्य से जुड़ी हर गतिविधि के लिए एक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में बदल रहा है।
पुस्तकालय के पास 3 लाख से अधिक पुस्तकों का संग्रह है, जिनमें कई दुर्लभ और नाजुक पुस्तकें भी शामिल हैं। महाराष्ट्र सरकार से मिले अनुदान की मदद से 2016 में पुस्तकालय ने इस संग्रह का डिजिटलीकरण शुरू किया था जो अब तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। इन डिजिटल पुस्तकों को ‘ग्रंथ संजीवनी’ पोर्टल के तहत उपलब्ध कराया गया है।
सोसाइटी की वाइस प्रेसिडेंट और इसके मुंबई रिसर्च सेंटर की चेयरपर्सन डॉ. शहरनाज़ नलवाला कहती हैं, “कोविड के बाद, हमने खुद को नए सिरे से परिभाषित किया है। हमारा उद्देश्य लोगों को फिर से पढ़ने के लिए प्रेरित करना है। पुस्तकालय महज़ किताबें उधार लेने की जगह नहीं, बल्कि सांस्कृतिक केंद्र भी बन सकते हैं।”
मुंबई रिसर्च सेंटर के माध्यम से, मुंबई केंद्रित व्याख्यान, ऐतिहासिक सैर और अन्य गतिविधियों का आयोजन किया जाता है। पुस्तकालय की कोशिश सदस्यों के लिए ‘किताबों के जादू’ के द्वार खोलने की है। पिछले साल, महाराष्ट्र सरकार से पहली बार एक करोड़ रुपये का अनुदान मिलने से पुस्तकालय को काफ़ी मदद मिली। हालांकि, अभी भी धन की कमी है।
220 साल पुराने इस पुस्तकालय में चार्ल्स डार्विन की ‘ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज’ (1859) के पहले संस्करण की एक प्रति समेत कई दुर्लभ पुस्तकें और कलाकृतियाँ हैं। जगह की कमी के कारण, ये दुर्लभ कृतियाँ शोधकर्ताओं के लिए तो उपलब्ध हैं, पर आम लोगों के लिए प्रदर्शित नहीं करी जा सकतीं। वर्ल्ड बुक डे मनाने के लिए, पुस्तकालय कई विशेष व्याख्यानों का आयोजन कर रहा है।































