बंबई हाईकोर्ट ने तो साफ़ कह दिया कि सरकार के फ़ैक्ट चेकिंग यूनिट (FCU) के नोटिफिकेशन पर रोक नहीं लगेगी! कुछ महीने पहले सरकार ने IT नियमों में बदलाव करके ये FCU वाला पंगा खड़ा किया था – सोशल मीडिया पर सरकार से जुड़ी ‘ग़लत और भ्रामक’ ख़बरों पर लगाम लगाने के लिए!
कॉमेडियन कुणाल कामरा और दूसरे लोगों ने इसके ख़िलाफ़ याचिका दायर की थी – कहते हैं, ‘ग़लत’ और ‘भ्रामक’ क्या होता है, साफ़ नहीं है, इसका दुरुपयोग हो सकता है!
याचिका में ये भी तर्क था कि ‘सरकार का कामकाज’ शब्द बहुत व्यापक है, मतलब इसमें कुछ भी आ जाएगा और इस नियम का दायरा बहुत ज़्यादा हो जाएगा! इस मसले पर पहले सुनवाई करते हुए जस्टिस गौतम पटेल और जस्टिस नीला गोखले में मतभेद हो गया था – इसीलिए मामला जस्टिस ए एस चंदूरकर को रेफ़र किया गया।
याचिकाकर्ताओं का वकील कहता है कि जब एक जज पहले ही नियम के ख़िलाफ़ बोल चुके हैं, तो कम से कम नोटिफिकेशन पर रोक तो लगनी चाहिए। पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में बयान दिया कि सरकार ने सबसे कम “बंधनकारी तरीका” अपनाया है, संविधान को ध्यान में रखते हुए। बस “सरकार के सख्त अर्थ वाले काम” पर ही नज़र रखी जाएगी, व्यंग्य, कॉमेडी, राजनीतिक टिप्पणियाँ – इनको रोकने का कोई इरादा नहीं है!
कोर्ट ने मेहता जी के बयान पर भरोसा दिखाया और अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया!
हालाँकि कोर्ट ने ये भी कहा कि याचिकाकर्ता अगर चाहें, तो सोशल मीडिया यूज़र होने के नाते इस FCU के काम को चुनौती दे सकते हैं, अगर ये राजनीतिक भाषणों या व्यंग्य पर कार्रवाई करता दिखे। पर ये भी सवाल है कि क्या FCU, जिसे सरकार चलाएगी, खुद अपने ख़िलाफ़ ऐसी बातें बर्दाश्त करेगी?




























