ई दिल्ली: आज़ादी के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियों को भारत लाने से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने इस मामले पर सवाल उठाते हुए कहा कि ये मुद्दा बार-बार क्यों उठाया जा रहा है।
दरअसल, याचिका में मांग की गई थी कि जापान के टोक्यो स्थित मंदिर में रखी गई नेताजी की अस्थियों को भारत लाने के लिए केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाए। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने इस याचिका पर विचार करने से मना कर दिया।
क्या थी याचिका की मांग?
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया था कि जापान के टोक्यो में स्थित एक मंदिर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियां रखी हुई बताई जाती हैं।
याचिकाकर्ता ने अदालत से आग्रह किया था कि केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाए कि इन अस्थियों को भारत लाकर उनका सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे को लेकर पहले भी कई बार याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं।
अदालत ने सवाल उठाया कि आखिर इस विषय को कितनी बार उठाया जाएगा। इसके बाद कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।
अस्थियों को लेकर लंबे समय से विवाद
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु को लेकर दशकों से अलग-अलग दावे और विवाद सामने आते रहे हैं।
एक धारणा ये है कि 1945 में ताइवान में हुए विमान हादसे में उनकी मृत्यु हो गई थी और उनकी अस्थियां जापान के टोक्यो स्थित रेनकोजी मंदिर में रखी गई हैं।
हालांकि कई लोग और संगठन इस दावे पर सवाल उठाते रहे हैं और नेताजी की मृत्यु को लेकर अलग-अलग सिद्धांत सामने आते रहे हैं।
कई आयोगों ने की जांच
नेताजी की मृत्यु के रहस्य को सुलझाने के लिए भारत सरकार ने समय-समय पर कई जांच आयोग भी गठित किए थे। इन आयोगों ने अलग-अलग रिपोर्ट पेश कीं, लेकिन नेताजी की मृत्यु को लेकर विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हो सका।
देश के महान स्वतंत्रता सेनानी थे नेताजी
नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक थे।
उन्होंने आजाद हिंद फौज (INA) का गठन किया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व किया। उनकी देशभक्ति, साहस और नेतृत्व ने लाखों भारतीयों को स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका पर सुनवाई से इनकार करने के बाद एक बार फिर नेताजी की अस्थियों का मुद्दा चर्चा में आ गया है। हालांकि इस विषय पर अंतिम सच्चाई को लेकर आज भी बहस जारी है, लेकिन देश के इतिहास में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का योगदान हमेशा अमिट रहेगा।
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