नियति का क्रूर खेल कहें या चिकित्सा विज्ञान की सीमाएं, 31 वर्षीय हरीश राणा ने मंगलवार शाम 4:10 बजे दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में अपनी अंतिम सांस ली। पिछले 13 वर्षों से ‘वेजिटेटिव स्टेट’ (अचेतन अवस्था) में पड़े हरीश की मृत्यु के साथ ही एक ऐसे अध्याय का अंत हो गया, जिसने भारतीय समाज, कानून और चिकित्सा जगत को ‘इच्छा मृत्यु’ और ‘जीवन की गरिमा’ जैसे गंभीर सवालों पर सोचने को मजबूर कर दिया था।
मौन की वो लंबी पीड़ादायक रात
हरीश राणा महज 18-19 साल के थे, जब एक हादसे ने उनके जीवन की गति को हमेशा के लिए रोक दिया था। पिछले 13 वर्षों से वे न बोल सकते थे, न सुन सकते थे और न ही अपनी पलकें झपकाकर कोई संकेत दे सकते थे। वे केवल सांस ले रहे थे, जबकि उनका शरीर एक बिस्तर तक सीमित होकर रह गया था। मंगलवार शाम जब उन्होंने अंतिम विदाई ली, तब उनके माता-पिता और भाई उनके सिरहाने मौजूद थे—ठीक वैसे ही जैसे वे पिछले 4,700 से अधिक दिनों से उनकी सेवा में लगे थे।
पिता की आँखों में गर्व और गम के आंसू
हरीश के पिता अशोक राणा ने अपने बेटे को अंतिम विदाई देते समय साहस का परिचय दिया। उन्होंने भारी मन से कहा, “हम सम्मान और गर्व के साथ हरीश को विदा करेंगे। वह एक ‘ब्रिलिएंट’ लड़का था, अपनी यूनिवर्सिटी का टॉपर था। आज उसकी विदाई ने उन हजारों परिवारों के लिए एक रास्ता खोल दिया है, जो इसी तरह की असहनीय पीड़ा से गुजर रहे हैं।”
अशोक राणा के शब्द उस दर्द को बयां करते हैं जो एक पिता ने अपने मेधावी बेटे को हर दिन घुट-घुट कर जीते हुए देख कर झेला है। उनके लिए हरीश केवल एक बेटा नहीं, बल्कि उनकी अटूट सेवा और ममता का प्रतीक था।
चिकित्सा और कानून के बीच एक मिसाल
हरीश राणा का मामला भारत में ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (Passive Euthanasia) यानी निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की बहस के केंद्र में रहा है।
* कानूनी संघर्ष: उनके माता-पिता ने लंबे समय तक हरीश को इस कष्टदायी जीवन से मुक्ति दिलाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी थी।
* मिसाल: हरीश की मृत्यु ने चिकित्सा जगत को यह सोचने पर विवश किया है कि तकनीक के सहारे किसी को जीवित रखना और उसे गरिमापूर्ण विदाई देना, इन दोनों के बीच की रेखा कितनी महीन है।
एक मेधावी छात्र का अधूरा सपना
हरीश अपने कॉलेज के दिनों में एक चमकता सितारा थे। यूनिवर्सिटी टॉपर होने के नाते उनसे परिवार और समाज को बड़ी उम्मीदें थीं। लेकिन एक छोटे से अंतराल ने उनकी पूरी दुनिया बदल दी। आज उनकी मृत्यु पर दिल्ली एम्स का वातावरण भी गमगीन रहा, जहाँ डॉक्टरों ने भी इस लंबी लड़ाई को करीब से देखा था।
शांति की ओर प्रस्थान
हरीश राणा अब उस पीड़ा से मुक्त हैं जिसने उन्हें 13 वर्षों तक जकड़े रखा। उनकी कहानी आने वाले समय में उन तमाम लोगों के लिए एक मार्गदर्शिका बनेगी जो असाध्य बीमारियों और अचेतन अवस्था में पड़े अपनों के लिए ‘सम्मानजनक मृत्यु’ के अधिकार की वकालत करते हैं।





























