देश की राजनीति और विधि जगत के एक सम्मानित नाम स्वराज कौशल का आज निधन हो गया। वे पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के पति और बीजेपी नेता बांसुरी स्वराज के पिता थे। पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे स्वराज कौशल ने आज अंतिम सांस ली। उनके निधन से राजनीतिक जगत, न्यायपालिका और उनके शुभचिंतकों में शोक की लहर है। परिवार ने बताया कि उनका अंतिम संस्कार 4 दिसंबर 2025 को शाम 4 बजकर 30 मिनट पर दिल्ली के लोदी रोड क्रीमेशन ग्राउंड में किया जाएगा।
बीजेपी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट जारी कर उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। पार्टी ने लिखा कि सांसद और प्रदेश मंत्री बांसुरी स्वराज के पिता स्वराज कौशल का निधन हो गया है और आज शाम उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

Image Source – X
देश के सबसे युवा राज्यपाल बने थे स्वराज कौशल
स्वराज कौशल का सार्वजनिक जीवन उपलब्धियों से भरा रहा। वर्ष 1990 में उन्हें मात्र 37 साल की उम्र में मिजोरम का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। उस समय वे देश के सबसे युवा राज्यपाल बने। उन्होंने फरवरी 1993 तक राज्यपाल के रूप में अपनी ज़िम्मेदारियां निभाईं। दिलचस्प बात ये है कि उनकी पत्नी सुषमा स्वराज भी अपने समय की सबसे युवा कैबिनेट मंत्री थीं। दोनों ने अलग-अलग राजनीतिक भूमिकाओं में रहते हुए देश की सेवा की।
राजनीति में भी स्वराज कौशल की पहचान अच्छी रही। वर्ष 1998 में वे हरियाणा विकास पार्टी के उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा सांसद चुने गए और 1998 से 2004 तक सदन के सदस्य रहे। ये भी उल्लेखनीय है कि 1998-99 में जब सुषमा स्वराज लोकसभा में थीं, तब स्वराज कौशल राज्यसभा में मौजूद थे, और बाद के वर्षों में दोनों राज्यसभा में साथ भी रहे।
क्यों बनाए गए थे मिजोरम के राज्यपाल?
इमरजेंसी के दौर में स्वराज कौशल का साहसिक योगदान उन्हें अलग पहचान दिलाता है। उन्होंने उस समय विपक्ष के कई प्रमुख नेताओं का मुकदमा लड़ा। जॉर्ज फर्नांडीस सहित 25 लोगों पर लगाए गए बड़ौदा डायनामाइट केस में उन्होंने उन सभी की पैरवी की और उन्हें राहत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उत्तर-पूर्व भारत के मामलों पर उनकी गहरी पकड़ थी। वर्ष 1979 में भूमिगत मिजो नेता लालडेंगा की रिहाई में वे प्रमुख रूप से शामिल थे। बाद में वे मिजो नेशनल फ्रंट के संवैधानिक सलाहकार बने। केंद्र सरकार के साथ उनकी कई दौर की वार्ताओं के बाद वर्ष 1986 में ऐतिहासिक मिजोरम शांति समझौता हुआ, जिसने करीब 20 वर्षों से चले आ रहे सशस्त्र संघर्ष का अंत कर दिया। इसी योगदान के कारण उन्हें आगे चलकर मिजोरम का राज्यपाल बनाया गया।
सबसे कम उम्र के एडवोकेट जनरल भी बने
कानून के क्षेत्र में भी उनका सफर शानदार रहा। दिसंबर 1986 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सीनियर एडवोकेट का दर्जा दिया था। केवल एक वर्ष बाद वे देश के सबसे कम उम्र के एडवोकेट जनरल बने। हालांकि उनके विचार राजनीतिक रूप से समाजवादी धड़े के करीब माने जाते थे, फिर भी 1975 में उनकी शादी एबीवीपी की सक्रिय कार्यकर्ता और आरएसएस नेता की बेटी सुषमा स्वराज से हुई। दोनों की विचारधाराएं भले अलग थीं, लेकिन व्यक्तिगत जीवन में वे एक-दूसरे के पूरक रहे। उनकी इकलौती बेटी बांसुरी स्वराज ऑक्सफोर्ड से शिक्षित हैं और आज बैरिस्टर के रूप में दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करती हैं।
लंबे सार्वजनिक जीवन के बावजूद स्वराज कौशल हमेशा शांत, संयत और लो-प्रोफाइल व्यक्तित्व रहे। उनकी कानूनी विशेषज्ञता, राजनीतिक समझ और कठिन परिस्थितियों को सहजता से संभालने की क्षमता उन्हें एक विशिष्ट स्थान देती है। उनका निधन भारतीय राजनीति और न्यायिक जगत के लिए एक बड़ी क्षति है।





























