बीजेपी का मिशन BMC: मुंबई की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी है। देश की सबसे ताकतवर और सबसे अमीर नगर निकाय, बृहन्मुंबई महानगरपालिका यानी बीएमसी, अब सिर्फ स्थानीय प्रशासन का सवाल नहीं रह गई है। ये चुनाव महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है। असली सवाल यही है कि क्या भारतीय जनता पार्टी उस किले को फतह कर पाएगी, जिस पर शिवसेना ने पिछले 25 वर्षों से अपना झंडा गाड़ रखा है।
BMC की सत्ता क्यों जरूरी है?
बीएमसी का महत्व उसकी ताकत से समझा जा सकता है। हजारों करोड़ रुपये के बजट वाली ये संस्था केवल सड़क, पानी और कचरा प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि ये राजनीतिक दलों के लिए संगठन खड़ा करने, नेताओं को तैयार करने और मुंबई की सत्ता पर पकड़ बनाए रखने का सबसे प्रभावी जरिया रही है। यही कारण है कि BMC पर नियंत्रण को अक्सर महाराष्ट्र की राजनीति की रीढ़ कहा जाता है।
1997 के बाद से बीएमसी (BMC) पर शिवसेना का दबदबा बना रहा। बाल ठाकरे की आक्रामक राजनीति, मराठी अस्मिता का भावनात्मक मुद्दा और हर वार्ड में मजबूत शाखा तंत्र शिवसेना की सबसे बड़ी ताकत रहे। मुंबई की गलियों से लेकर महानगरपालिका के गलियारों तक शिवसेना की मौजूदगी इतनी गहरी थी कि उसे चुनौती देना आसान नहीं था। लेकिन साल 2022 में पार्टी टूटने के बाद ये मजबूत किला पहली बार हिलता नजर आया।
एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुए शिवसेना विभाजन ने पार्टी को दो हिस्सों में बांट दिया। एक तरफ शिंदे गुट है, जो सत्ता में है और खुद को असली शिवसेना बताता है, तो दूसरी तरफ उद्धव ठाकरे की शिवसेना-यूबीटी है, जो भावनात्मक अपील और विरासत के सहारे मैदान में है। इस टूट ने बीएमसी (BMC) चुनाव को पूरी तरह बदल दिया है। अब मुकाबला केवल दलों के बीच नहीं, बल्कि शिवसेना की पहचान को लेकर भी है।
इसी बदले हुए राजनीतिक माहौल में बीजेपी ने बीएमसी फतह करने का सबसे बड़ा सपना देखा है। 2017 के चुनाव में बीजेपी ने 82 सीटें जीतकर शिवसेना को कड़ी चुनौती दी थी और तब से पार्टी का आत्मविश्वास लगातार बढ़ा है। शहरी मध्यम वर्ग, व्यापारिक समुदाय और गैर-मराठी वोट बैंक में बीजेपी की पकड़ मजबूत हुई है। इसके अलावा केंद्र और राज्य दोनों में सत्ता में होने का फायदा भी बीजेपी को मिलता दिख रहा है। पार्टी अब बीएमसी (BMC) में सिर्फ भागीदार नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता की भूमिका चाहती है।
शिंदे गुट के अस्तित्व की परीक्षा!
बीजेपी के लिए एक बड़ा फैक्टर एकनाथ शिंदे का गुट भी है। शिंदे गुट के पास शिवसेना के कई पुराने चेहरे, पूर्व पार्षद और स्थानीय नेटवर्क मौजूद हैं। अगर बीजेपी और शिंदे गुट के बीच तालमेल जमीनी स्तर पर मजबूत रहा, तो ये उद्धव ठाकरे के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बीएमसी चुनाव शिंदे गुट के अस्तित्व की असली परीक्षा साबित होगा।
उधर उद्धव ठाकरे के सामने चुनौती कहीं ज्यादा कठिन है। पार्टी टूटने के बाद संगठन कमजोर पड़ा है, लेकिन उद्धव ठाकरे अब भी भावनात्मक जुड़ाव को अपना सबसे बड़ा हथियार मानते हैं। वे लगातार ये संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि असली शिवसेना वही हैं और मुंबई उनकी पार्टी की आत्मा रही है। सवाल ये है कि क्या ये भावनात्मक अपील और नाराजगी की राजनीति वोट में तब्दील हो पाएगी।
स्थानीय मुद्दे की अहमियत
बीएमसी (BMC) चुनाव में हमेशा स्थानीय मुद्दे अहम रहे हैं। खराब सड़कें, बरसात में जलभराव, गड्ढे, पानी की सप्लाई और भ्रष्टाचार जैसे सवाल मतदाताओं को सीधे प्रभावित करते हैं। लेकिन इस बार माहौल अलग नजर आ रहा है। राष्ट्रीय राजनीति, सत्ता का समीकरण और नेतृत्व की लड़ाई स्थानीय मुद्दों पर भारी पड़ती दिख रही है। मतदाता ये तय करने की स्थिति में हैं कि वे प्रशासनिक स्थिरता को चुने या राजनीतिक संदेश को।
इस पूरे समीकरण में कांग्रेस और एनसीपी की भूमिका भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती। मुंबई में उनकी ताकत सीमित जरूर है, लेकिन त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय मुकाबले में उनके वोट निर्णायक साबित हो सकते हैं। यही कारण है कि उन्हें पूरी तरह बाहर की ताकत मानना जल्दबाजी होगी।
इतिहास रचेगी बीजेपी?
कुल मिलाकर बीएमसी (BMC) चुनाव मुंबई से कहीं आगे की तस्वीर दिखाएगा। ये चुनाव बताएगा कि शिवसेना का भविष्य किस दिशा में जाएगा, बीजेपी मुंबई में इतिहास रच पाएगी या नहीं और महाराष्ट्र की राजनीति आने वाले वर्षों में किस मोड़ पर खड़ी होगी। अब सबकी निगाहें इसी सवाल पर टिकी हैं कि क्या बीजेपी का मिशन बीएमसी (BMC) सफल होगा या शिवसेना का 25 साल पुराना किला एक बार फिर अडिग खड़ा रहेगा।
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