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Ajit Pawar Plane Crash: प्रशासनिक अनुशासन के पर्याय और बेबाक राजनीति के ‘दादा’: एक युग का अंत

Ajit Pawar Plane Crash:
Ajit Pawar Plane Crash:
Ajit Pawar Plane Crash: महाराष्ट्र की राजनीति के क्षितिज पर अपनी एक अलग और अमिट पहचान बनाने वाले उपमुख्यमंत्री अजित पवार का असमय चले जाना केवल एक राजनीतिक क्षति नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक युग का अंत है। उन्हें ‘दादा’ के नाम से जाना जाता था, और यह संबोधन केवल प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि उनके नेतृत्व के प्रति सम्मान और उनके द्वारा बरती जाने वाली अनुशासनप्रियता का परिचायक था।

विरासत से पहचान तक का सफर
राजनीति अजित पवार को विरासत में मिली थी, लेकिन उन्होंने कभी भी केवल अपने उपनाम के सहारे राजनीति नहीं की। सांगली और बारामती की मिट्टी से शुरू हुआ उनका सफर मंत्रालय की छठी मंजिल तक पहुँचा, तो इसके पीछे उनकी अपनी मेहनत और सांगठनिक क्षमता थी। वे सही मायने में ‘जमीनी नेता’ थे, जिन्हें संख्याबल की गहरी समझ और राजनीति के सही समय को पहचानने का अद्भुत कौशल प्राप्त था।

साफगोई: जो लोकप्रियता से ऊपर थी
आज के दौर में जहाँ राजनेता अक्सर जनता को लुभाने के लिए लोकलुभावन वादे करते हैं, अजित दादा अपनी साफगोई के लिए जाने जाते थे। उनका व्यक्तित्व विरोधाभासों से भरा लेकिन पारदर्शी था:

  • स्पष्ट वक्ता: वे कभी भी ऐसा वादा नहीं करते थे जिसे वे पूरा न कर सकें।
  • प्रशासनिक पकड़: मंत्रालय में उनकी मौजूदगी मात्र से फाइलों की गति बढ़ जाया करती थी।
  • नियमों के प्रति निष्ठा: उनके लिए नियम सर्वोपरि थे, चाहे सामने कोई भी खड़ा हो।
  • मंत्रालय का वह संस्मरण: ‘जो काम नहीं हो सकता, उसके लिए जिद मत करो’

लेखक ने उनके कार्यालय का जो वर्णन किया है, वह अजित दादा की कार्यशैली का सबसे सटीक चित्रण है। उनके केबिन में लोगों की भीड़ के बीच भी वे हर व्यक्ति के काम पर ध्यान देते थे और त्वरित निर्णय लेते थे।

जब एक सज्जन ने नियमों के विरुद्ध काम के लिए उनसे आग्रह किया, तो दादा का दो-टूक जवाब—”यह नियम में नहीं बैठता”—उनकी उस ईमानदारी को दर्शाता है जो आज की राजनीति में दुर्लभ है। जब उस व्यक्ति ने जिद की, तो दादा का गुस्सा उनकी इसी प्रतिबद्धता का परिणाम था कि वे सरकारी व्यवस्था का दुरुपयोग नहीं होने देंगे। उनकी नाराजगी में भी एक सीख छिपी होती थी कि राजनीति और प्रशासन भावनाओं से नहीं, बल्कि नियमों और निष्पक्षता से चलते हैं।

एक अपूरणीय क्षति
अजित पवार के जाने से महाराष्ट्र ने एक ऐसा नेता खो दिया है जो सुबह 6 बजे से काम शुरू करने की क्षमता रखता था और जिसमें जटिल से जटिल बजट को चुटकियों में सुलझाने का हुनर था। उनका जाना राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में एक ऐसा शून्य छोड़ गया है, जिसे भरना निकट भविष्य में मुमकिन नहीं दिखता।

वे अपनी शर्तों पर जिए और अपनी पहचान अपने फैसलों से बनाई। महाराष्ट्र की जनता उन्हें हमेशा एक ऐसे नेता के रूप में याद रखेगी जिसने काम को ही अपनी पूजा माना।

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