महाराष्ट्र की राजनीति में संजय राउत के बयान अक्सर उस ‘पॉलिटिकल पिच’ की तरह होते हैं, जिस पर खेल शुरू होने से पहले ही शोर मच जाता है। इस बार उनके निशाने पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का ‘मुस्लिम प्रेम’ और महाविकास अघाड़ी (MVA) के दिग्गजों—उद्धव ठाकरे और शरद पवार—का संसदीय भविष्य है।
संघ की शाखा और सलमान खान: स्वागत या रणनीति?
नेहरू सेंटर में मोहन भागवत और सलमान खान की मुलाकात ने महाराष्ट्र की सियासत में पारा चढ़ा दिया है। संजय राउत ने इसे ‘सेलेब्रिटी पॉलिटिक्स’ करार देते हुए एक तीखा सवाल उछाला है।
- चुनिंदा उदारवाद पर चोट: राउत का तर्क है कि अगर संघ सलमान खान का स्वागत कर सकता है, तो क्या वह आम मुस्लिम नागरिकों के लिए भी अपनी शाखाओं के द्वार उतने ही सहजता से खोलेगा?
- वैचारिक विरोधाभास: उन्होंने आरोप लगाया कि एक तरफ संघ और उससे जुड़े संगठन समाज में ध्रुवीकरण की राजनीति करते हैं, वहीं दूसरी तरफ फिल्मी सितारों के साथ सौहार्द दिखाते हैं। यह विरोधाभास जनता को भ्रमित करने वाला है।
मई 2026: उद्धव और पवार के लिए ‘करो या मरो’ का साल
राजनीति केवल बयानों से नहीं, बल्कि ‘नंबर गेम’ से चलती है। मई 2026 में महाराष्ट्र विधान परिषद और राज्यसभा की सीटें खाली हो रही हैं, जो MVA के भविष्य की दिशा तय करेंगी।
संसदीय समीकरणों पर एक नज़र:
| नेता का नाम | सदन | सीट खाली होने की तिथि | मुख्य चुनौती |
|---|---|---|---|
| उद्धव ठाकरे | विधान परिषद | 13 मई 2026 | शिवसेना (UBT) के पास अपने दम पर जिताने के लिए पर्याप्त विधायक नहीं |
| शरद पवार | राज्यसभा | 02 अप्रैल 2026 | दोबारा संसद पहुंचने के लिए सहयोगी दलों के अतिरिक्त वोटों की आवश्यकता |
‘गिव एंड टेक’: गठबंधन की मजबूरी या मजबूती?
राउत का स्पष्ट कहना है कि उद्धव ठाकरे को विधान परिषद और शरद पवार को राज्यसभा भेजने के लिए MVA के घटक दलों—कांग्रेस, शिवसेना (UBT), और शरद पवार की NCP—को एकजुट होना ही होगा।
- अस्तित्व की लड़ाई: यदि गठबंधन के बीच वोटों का तालमेल नहीं बैठा, तो महाराष्ट्र की राजनीति के ये दो सबसे बड़े स्तंभ सदन से बाहर हो सकते हैं।
- रणनीतिक तालमेल: यह केवल दो नेताओं को सदन भेजने की बात नहीं है, बल्कि यह 2026 के राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा-महायुति के खिलाफ एकजुटता दिखाने का लिटमस टेस्ट है।
विचारधारा और गणित का संगम
संजय राउत का ताजा हमला यह संकेत दे रहा है कि आने वाले समय में महाराष्ट्र की लड़ाई दो स्तरों पर होगी। एक तरफ वैचारिक मोर्चा होगा जहाँ संघ के ‘बदलते स्वरूप’ पर सवाल उठेंगे, और दूसरी तरफ रणनीतिक मोर्चा होगा जहाँ एक-एक वोट की कीमत चुकाकर गठबंधन को बचाना होगा।































