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नेतृत्व का भंवर और ‘अंतरात्मा’ का कोलाहल, मणिशंकर अय्यर ने केरल को लेकर की भविष्यवाणी

मणिशंकर अय्यर
मणिशंकर अय्यर

भारतीय राजनीति के इतिहास में ‘अंतरात्मा की आवाज’ का एक आध्यात्मिक और नैतिक महत्व रहा है, जिसकी मिसाल महात्मा गांधी ने पेश की थी। परंतु आज कांग्रेस और विपक्षी खेमे में सुनाई दे रही ‘अंतरात्मा की आवाजें’ नैतिकता से कम और असंतोष व भ्रम से अधिक प्रेरित दिखाई देती हैं। आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जिस तरह का विरोधाभास सामने आ रहा है, वह न केवल गठबंधन की सेहत के लिए हानिकारक है, बल्कि लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष की अवधारणा पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।

अपनों के वार और चुनावी चुनौतियां
केरल, असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के चुनावी मुहाने पर खड़ी कांग्रेस के लिए मणिशंकर अय्यर जैसे पुराने वफादारों के बयान किसी ‘सेल्फ-गोल’ से कम नहीं हैं। केरल में जहां कांग्रेस अपनी वापसी की उम्मीद लगाए बैठी है, वहीं अय्यर द्वारा वामपंथी मुख्यमंत्री पिनारयी विजयन की तारीफ करना और कांग्रेस की हार की भविष्यवाणी करना आत्मघाती कदम है।

अय्यर का यह कहना कि वे ‘गांधीवादी, नेहरूवादी और राजीववादी हैं, लेकिन राहुलवादी नहीं’, पार्टी के भीतर की उस गहरी खाई को उजागर करता है जो पुराने और नए नेतृत्व के बीच बन चुकी है। जब पार्टी के दिग्गज ही राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने में हिचकिचा रहे हों, तो आम कार्यकर्ता और मतदाताओं के बीच क्या संदेश जाएगा?

ममता, स्टालिन या राहुल: नेतृत्व का पेच
विपक्ष के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रधानमंत्री मोदी के विकल्प के रूप में किसे पेश किया जाए?

  • ममता बनर्जी: संजय बारू जैसे रणनीतिकार ममता को नेतृत्व सौंपने की वकालत कर रहे हैं, क्योंकि उनमें लड़ने का जज्बा और क्षेत्रीय पकड़ मजबूत है।
  • एम.के. स्टालिन: मणिशंकर अय्यर का झुकाव स्टालिन की ओर है, क्योंकि वे क्षेत्रीय अधिकारों की बात प्रखरता से रखते हैं।
  • राहुल गांधी: राहुल का लड़ाकू रवैया और तानाशाही के खिलाफ उनकी दृढ़ता काबिले तारीफ है, लेकिन चुनावी सफलता में उसे परिवर्तित न कर पाना उनकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हो रही है।

मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी के बीच समन्वय की कमी के दावे यह बताते हैं कि संगठन का ढांचा अब भी उतना सुदृढ़ नहीं है जितना मनमोहन-सोनिया युग में हुआ करता था।

अराजकता और भविष्य की राह
लेख का यह तर्क अत्यंत गंभीर है कि सत्ता से लंबे समय तक बाहर रहने पर राजनीतिक दल ‘मकड़जाल’ का शिकार हो जाते हैं और उनमें सत्ता की भूख समाप्त होने लगती है। भाजपा की ‘बैसाखी’ वाली सरकार के बावजूद विपक्ष का बिखरा हुआ होना जनता में निराशा पैदा करता है।

असम में भूपेन बोरा का विद्रोह और महाराष्ट्र में कांग्रेस का अकेले रास्ता चुनना यह बताता है कि ‘इंडिया गठबंधन’ के घटक दल राष्ट्रीय हितों से ज्यादा स्थानीय वर्चस्व को प्राथमिकता दे रहे हैं।आज सवाल केवल राजनीतिक समीकरणों का नहीं, बल्कि राष्ट्र की दिशा का है। यदि विपक्ष ‘धार्मिक भांग’ और ‘विदेशी दासता’ जैसे मुद्दों पर जनता को जागरूक करना चाहता है, तो उसे पहले अपने भीतर के कोलाहल को शांत करना होगा।

ममता हों, स्टालिन हों या कोई और—नेतृत्व के मुद्दे पर निर्णय लेने में हो रही देरी केवल भाजपा के मार्ग को निष्कंटक बना रही है। ‘इंडिया ब्लॉक’ को जागना होगा, वरना इतिहास उन्हें अवसर गंवाने वाले खिलाड़ियों के रूप में याद रखेगा।

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