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खतरे में हिमालय का सुरक्षा कवच, 3500 मीटर तक पहुँची वनाग्नि, बुग्याल और दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ खाक

हिमालय
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देवभूमि उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग ने इस बार प्रकृति के उन पैमानों को तोड़ दिया है, जिन्हें वैज्ञानिक दशकों से ‘सुरक्षित’ मानते थे। हिमालय की जिन ऊंचाइयों पर कभी नमी और कड़ाके की ठंड के कारण आग लगने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, आज वहां धधकती लपटें दिखाई दे रही हैं। यह न केवल पर्यावरण के लिए चेतावनी है, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक बड़ा ‘अलार्म’ है।

शोध का बड़ा खुलासा: 3 हजार मीटर का दायरा पार
जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान और IIT मुंबई के ताजा संयुक्त शोध ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। रिपोर्ट के अनुसार, वनाग्नि अब 800-2000 मीटर की पारंपरिक ‘चीड़ बेल्ट’ (Pine Belt) को पार कर 3000 से 3500 मीटर की ऊंचाई तक पहुंच गई है।

पर्यावरण वैज्ञानिक संदीपन मुखर्जी के अनुसार, इस साल का ‘विंटर ड्राई स्पेल’ (सर्दियों में बारिश न होना) इस तबाही का मुख्य कारण बना है। इसके चलते अब आग ओक, सीडर और दुर्लभ अल्पाइन घास के मैदानों (बुग्यालों) तक पहुंच रही है, जो हिमालय के सुरक्षा कवच माने जाते हैं। नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व जैसे संवेदनशील इलाकों में आग का पहुंचना जैव विविधता के लिए अपूरणीय क्षति है।

दुर्लभ जड़ी-बूटियों और अर्थव्यवस्था पर चोट
पूर्व वनाधिकारी मदन सिंह बिष्ट ने बताया कि 3000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर स्थित वनस्पतियां और अल्पाइन बुग्याल पहाड़ की जीवनरेखा हैं। यहाँ आग पहुँचने का अर्थ है:

  • दुर्लभ संपदा का नाश: कीड़ा जड़ी, जटामासी, कुटकी, वन ककड़ी और अतीसा जैसी बहुमूल्य और दुर्लभ जड़ी-बूटियां जलकर राख हो रही हैं।
  • आर्थिक संकट: पहाड़ की एक बड़ी आबादी इन जड़ी-बूटियों के संग्रहण और व्यापार पर निर्भर है। आग से बुग्यालों का नष्ट होना स्थानीय अर्थव्यवस्था को वर्षों पीछे धकेल सकता है।

सीजन शुरू होने से पहले ही तबाही का मंजर
उत्तराखंड में आधिकारिक तौर पर ‘फायर सीजन’ 15 फरवरी से 15 जून तक माना जाता है। लेकिन इस बार गर्मी शुरू होने से पहले ही स्थिति भयावह हो चुकी है:

  • तबाही के आंकड़े: सीजन शुरू होने से पहले ही 58 बार जंगलों में आग लग चुकी है, जिससे 42 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है।
  • विभाग की तैयारी: वन विभाग ने स्थिति से निपटने के लिए प्रदेश भर में 1438 क्रू स्टेशन स्थापित किए हैं। इसके साथ ही हर संवेदनशील स्थान पर अतिरिक्त ‘फायर वॉचर’ तैनात किए गए हैं ताकि आग की सूचना मिलते ही तत्काल प्रतिक्रिया दी जा सके।

कुदरत का आखिरी अलार्म
हिमालय की ऊंचाइयों पर बर्फ की जगह आग की लपटें दिखना वैश्विक जलवायु परिवर्तन का सीधा संकेत है। यदि अल्पाइन क्षेत्र इसी तरह जलते रहे, तो ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ जाएगी और भविष्य में जल संकट गहरा सकता है। अब समय केवल क्रू स्टेशन बनाने का नहीं, बल्कि हिमालय के प्रति अपनी नीतियों को गहराई से बदलने का है।

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