महाराष्ट्र

महाराष्ट्र की ‘पॉलिटिकल मैच्योरिटी’ या नई रणनीति? राज ठाकरे ने उठाए शहर और सुरक्षा से जुड़े बुनियादी सवाल

राज ठाकरे
राज ठाकरे

महाराष्ट्र: हाल ही में एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस से हुई मुलाकातों को लेकर उठ रहे राजनीतिक कयासों पर राज ठाकरे ने दो टूक जवाब दिया। उन्होंने साफ किया कि चुनाव खत्म होने का मतलब संवाद खत्म होना नहीं होता। ठाकरे का तर्क सीधा था: “अगर हमें कुछ अच्छा करने के लिए सुझाव देना है, तो क्या मैं मिल नहीं सकता?”

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि महाराष्ट्र की एक पुरानी परंपरा रही है जहाँ चुनाव के बाद सभी दलों के नेता साथ बैठकर राज्य के विकास पर चर्चा करते थे। उनका इशारा साफ है कि आज की राजनीति में जो ‘छुआछूत’ और ‘दुश्मनी’ बढ़ गई है, वह राज्य के हित में नहीं है।

विकास की नई परिभाषा: फ्लाईओवर से आगे की सोच
राज ठाकरे ने विकास (Development) के मौजूदा मॉडल पर कड़ा प्रहार किया। उनके अनुसार:

  • सड़क और फ्लाईओवर ही विकास नहीं: केवल कंक्रीट का ढांचा खड़ा करना प्रगति नहीं है।
  • पार्किंग का संकट: मुंबई और पुणे जैसे शहरों में बाहर से आने वालों की बढ़ती संख्या और वाहनों के दबाव ने सड़कों को ‘पार्किंग लॉट’ बना दिया है।
  • नागरिक मुद्दे: जब तक शहरों में रहने की सीमा और वाहनों के प्रबंधन पर ठोस नीति नहीं बनेगी, बुनियादी ढांचा चरमराता रहेगा।

उन्होंने स्पष्ट किया कि उपमुख्यमंत्री से उनकी मुलाकात का मुख्य एजेंडा यही था—प्रशासन को शहर की जमीनी हकीकत से रूबरू कराना।

घुसपैठ और सुरक्षा: “अपराधी हमारे बीच ही हैं”
बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर राज ठाकरे ने एक गंभीर पहलू की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने केवल प्रवासियों को ही नहीं, बल्कि उन्हें संरक्षण देने वाले स्थानीय तंत्र को भी घेरे में लिया। इन बांग्लादेशियों को आधार कार्ड और सरकारी दस्तावेज बनाकर देने वाले लोग तो यहीं के हैं। उन पर कार्रवाई कब होगी?

उनका यह सवाल सीधे तौर पर प्रशासन और उस ‘सिस्टम’ पर है जो भ्रष्टाचार के चलते देश की सुरक्षा से समझौता कर रहा है। उन्होंने केंद्र और राज्य दोनों से मांग की कि शहरों की ‘वहन क्षमता’ (Carrying Capacity) तय होनी चाहिए कि एक शहर आखिर कितने लोगों का बोझ उठा सकता है।

नागरिक धर्म और राजनीति का संतुलन
राज ठाकरे ने स्पष्ट कर दिया कि वे एक पार्टी अध्यक्ष के साथ-साथ एक सजग नागरिक के तौर पर अपनी भूमिका निभाते रहेंगे। उन्होंने विरोधियों को कड़ा संदेश दिया कि जिसे जो राजनीति करनी है करे, लेकिन वे जनहित के मुद्दों पर सरकार को टोकना और सुझाव देना बंद नहीं करेंगे।

उनका यह रुख संकेत देता है कि आने वाले समय में वे महाराष्ट्र की राजनीति में ‘कंस्ट्रक्टिव अपोजिशन’ (रचनात्मक विपक्ष) की भूमिका निभाने की तैयारी में हैं, जो केवल विरोध के लिए विरोध नहीं, बल्कि समाधान की बात करता है।

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