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भारत के इन 6 मंदिरों में पुरुषों का प्रवेश है वर्जित, जानें धार्मिक और सांस्कृतिक कारण

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भारत आस्था और विविध परंपराओं का देश है। आमतौर पर मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश को लेकर बहस सुनने को मिलती है, लेकिन देश में कुछ ऐसे मंदिर भी हैं जहां विशेष अनुष्ठानों या परंपराओं के दौरान पुरुषों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया जाता है। ये नियम विरोध या भेदभाव के लिए नहीं, बल्कि विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं और प्रतीकात्मक परंपराओं से जुड़े हैं। आइए जानते हैं ऐसे छह प्रमुख मंदिरों के बारे में।

1. अट्टुकल भगवती मंदिर, केरल

केरल स्थित अट्टुकल भगवती मंदिर को “महिलाओं का सबरीमाला” भी कहा जाता है। यहां आयोजित होने वाला प्रसिद्ध अट्टुकल पोंगल उत्सव पूरी तरह महिलाओं को समर्पित होता है। इस दौरान लाखों महिलाएं देवी को प्रसाद चढ़ाने के लिए एकत्रित होती हैं और सामूहिक रूप से पूजा करती हैं।

उत्सव के समय पुरुष अनुष्ठानिक क्षेत्र से दूर रहते हैं। ये प्रतिबंध विरोध नहीं, बल्कि नारी शक्ति के सामूहिक आध्यात्मिक प्रदर्शन का प्रतीक है।

2. चक्कुलाथुकावु मंदिर, केरल

इस मंदिर में “नारी पूजा” का विशेष आयोजन होता है, जिसमें महिलाओं को देवी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है। मंदिर का मुख्य पुजारी प्रतीकात्मक रूप से महिला भक्तों के चरण धोता है।

ये अनुष्ठान सामाजिक संरचना को प्रतीकात्मक रूप से उलटते हुए स्त्री शक्ति के सम्मान का संदेश देता है। इस अवसर पर महिलाओं की केंद्रीय भूमिका होती है।

3. ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर (राजस्थान)

पुष्कर का प्रसिद्ध ब्रह्मा मंदिर ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां पुरुषों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, लेकिन कुछ विशेष पूजा स्थलों पर विवाहित पुरुषों को अनुष्ठान करने की अनुमति नहीं दी जाती।

पौराणिक कथा के अनुसार, ब्रह्मा द्वारा किए गए यज्ञ के दौरान माता सरस्वती के क्रोधित होने की घटना से ये परंपरा जुड़ी मानी जाती है। ये नियम सदियों से चला आ रहा है।

4. कामाख्या मंदिर, असम

असम का कामाख्या मंदिर शक्तिपीठों में प्रमुख स्थान रखता है। यहां देवी की पूजा प्राकृतिक शिला रूप में होती है, जो स्त्रीत्व और सृजन शक्ति का प्रतीक है।

अंबुबाची मेले के दौरान मंदिर तीन दिनों के लिए बंद रहता है, जिसे देवी के मासिक धर्म चक्र का प्रतीक माना जाता है। हालांकि पुरुषों पर स्थायी प्रतिबंध नहीं है, लेकिन ये उत्सव स्त्री सृजन क्षमता के सम्मान पर केंद्रित है।

5. संतोषी माता मंदिर, वृंदावन

वृंदावन स्थित संतोषी माता मंदिर में कुछ विशेष दिनों पर पुरुषों को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं होती। यहां शुक्रवार का व्रत रखने वाली महिलाएं विशेष अनुष्ठान करती हैं।

यह परंपरा भक्ति और पारिवारिक सुख-समृद्धि से जुड़ी आस्था का हिस्सा है।

6. भगवती मंदिर, तमिलनाडु

तमिलनाडु के कुछ भगवती मंदिरों में देवी की पूजा कुंवारी स्वरूप में की जाती है। विशेष समारोहों के दौरान पुरुषों को गर्भगृह में प्रवेश नहीं दिया जाता।

ये प्रतिबंध देवी की पवित्रता, स्वतंत्रता और आत्मनिर्भर शक्ति के प्रतीक के रूप में माना जाता है, न कि किसी प्रकार के भेदभाव के रूप में।

परंपरा और आस्था का अनोखा संतुलन

इन मंदिरों की परंपराएं दर्शाती हैं कि भारतीय संस्कृति में स्त्री शक्ति को विशेष सम्मान दिया गया है। “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” – जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां देवताओं का वास माना जाता है।

इन नियमों का उद्देश्य किसी वर्ग को कमतर दिखाना नहीं, बल्कि विशेष आध्यात्मिक भाव और प्रतीकात्मक मान्यताओं को संरक्षित करना है। यही भारत की विविध और गहरी धार्मिक परंपराओं की पहचान है।

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