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मोबाइल की लत पर लगेगा ब्रेक? बिहार सरकार बना रही खास नीति

बिहार सरकार
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बिहार सरकार राज्य में बच्चों और किशोरों के बढ़ते स्क्रीन टाइम तथा सोशल मीडिया के प्रभाव को लेकर नई नीति तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। विधानसभा में इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने जानकारी दी कि सरकार इस संबंध में व्यापक नीति बनाने की प्रक्रिया में है।

सरकार ने बेंगलुरु स्थित राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान (निम्हांस) से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। रिपोर्ट मिलने के बाद सभी संबंधित विभागों और हितधारकों के साथ बैठक कर नीति का प्रारूप तैयार किया जाएगा।

स्क्रीन टाइम और ऑनलाइन गेमिंग पर बढ़ती चिंता

विधानसभा में ये मुद्दा जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के विधायक समृद्ध वर्मा ने उठाया। उन्होंने कहा कि बच्चों में मोबाइल, सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग की लत एक “अदृश्य महामारी” की तरह फैल रही है।

उनका कहना था कि बच्चों का समय अब किताबों, खेलकूद और रचनात्मक गतिविधियों की बजाय लंबे समय तक स्क्रीन स्क्रॉलिंग में बीत रहा है। इससे एकाग्रता में कमी, व्यवहार में बदलाव और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल रहे हैं।

उन्होंने ये भी कहा कि राज्य में इंटरनेट की पहुंच तो तेजी से बढ़ी है, लेकिन डिजिटल साक्षरता का स्तर अभी भी पर्याप्त नहीं है।

निम्हांस से मांगी गई विस्तृत रिपोर्ट

उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सदन में बताया कि ये विषय बहु-क्षेत्रीय है और इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, सूचना प्रौद्योगिकी सहित कई विभागों की भूमिका होगी।

उन्होंने कहा कि नाबालिगों के बीच बढ़ते स्क्रीन टाइम और ऑनलाइन गेमिंग पर नियंत्रण के लिए वैज्ञानिक और विशेषज्ञ सलाह आवश्यक है। इसी कारण सरकार ने निम्हांस से विस्तृत अध्ययन रिपोर्ट मांगी है।

रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद राज्य सरकार नीति निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाएगी।

डिजिटल हाइजीन को पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग

विधायक समृद्ध वर्मा ने सुझाव दिया कि राज्य के सभी सरकारी विद्यालयों में “डिजिटल हाइजीन” को अनिवार्य पाठ के रूप में शामिल किया जाए। उनका तर्क था कि बच्चों को केवल तकनीक का उपयोग सिखाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके दुष्प्रभावों से बचाव के उपाय भी सिखाए जाने चाहिए।

इसके अलावा, उन्होंने प्रत्येक जिला अस्पताल में “एडिक्शन काउंसिलिंग सेंटर” स्थापित करने का प्रस्ताव रखा, ताकि डिजिटल लत से जूझ रहे बच्चों और अभिभावकों को परामर्श मिल सके।

ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने के लिए जीविका दीदी नेटवर्क के माध्यम से माताओं को “स्क्रीन टाइम प्रबंधन” की जानकारी देने का सुझाव भी दिया गया।

आईटी विभाग ने भी जताई सहमति

सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्रेयसी सिंह ने कहा कि विभाग ने निम्हांस से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद सरकार इस विषय पर व्यापक और संतुलित नीति लागू करेगी।

क्यों जरूरी है नई नीति?

विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों में नींद की समस्या, ध्यान में कमी, चिड़चिड़ापन और सामाजिक अलगाव जैसी चुनौतियां बढ़ सकती हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म का सकारात्मक उपयोग तभी संभव है, जब संतुलन और जागरूकता दोनों मौजूद हों।

बिहार सरकार की प्रस्तावित नीति का उद्देश्य बच्चों को तकनीक से पूरी तरह दूर करना नहीं, बल्कि सुरक्षित और संतुलित उपयोग की दिशा में मार्गदर्शन देना बताया जा रहा है।

बिहार में बच्चों के बढ़ते मोबाइल उपयोग और सोशल मीडिया प्रभाव को देखते हुए सरकार की यह पहल महत्वपूर्ण मानी जा रही है। विशेषज्ञ रिपोर्ट के आधार पर बनने वाली नई नीति से राज्य में डिजिटल अनुशासन और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर ठोस ढांचा तैयार होने की उम्मीद है।

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