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महाराष्ट्र: 8,000 करोड़ का ‘पोषण’ बना जानवरों का चारा, ढाई साल में 34 हजार मासूमों की मौत

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महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो ‘विकसित भारत’ के दावों पर सवालिया निशान खड़ी करती है। राज्य के नागपुर, अमरावती, अकोला, यवतमाल, छत्रपति संभाजीनगर और मुंबई जैसे शहरों में कुपोषण का दानव मासूमों को निगल रहा है। पिछले ढाई वर्षों के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि राज्य में 34,325 बच्चों की मौत कुपोषण के कारण हुई है।

लेकिन इस त्रासदी का सबसे वीभत्स पहलू यह है कि जिस आहार को बच्चों की जान बचाने के लिए भेजा जा रहा है, उसे बच्चे नहीं बल्कि गाय-भैंस खा रहे हैं।

आंकड़ों का खौफनाक सच
जो आंकड़े सामने आए हैं, वे किसी भी संवेदनशील समाज को विचलित कर सकते हैं:
मौतों का आंकड़ा: ढाई साल में 34,325 बच्चों की मौत।
कुपोषित बच्चों की संख्या: अकेले संभाजीनगर में 651 और पूरे राज्य में 1,13,935 बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं।
भारी-भरकम बजट: सरकार हर साल कुपोषण मिटाने के नाम पर 7,000 से 8,000 करोड़ रुपए खर्च कर रही है।

भास्कर ग्राउंड रिपोर्ट: क्यों फेल हो रही है योजना?
जिले की 15 आंगनवाड़ियों में 10 दिनों तक किए गए सर्वे में ‘टेक-होम राशन’ (THR) की जो हकीकत सामने आई, वह भ्रष्टाचार और लापरवाही का मिश्रण है।

1. स्वादहीन और बदबूदार आहार
सर्वे के दौरान परिजनों और आंगनवाड़ी स्टाफ ने बताया कि सरकार द्वारा दिए जाने वाले राशन के पैकेटों से अजीब सी बदबू आती है। इसका स्वाद इतना खराब है कि बच्चे इसे खाने से इनकार कर देते हैं। मजबूरन, गरीब परिवार इस आहार को फेंकने के बजाय अपने पालतू जानवरों (गाय-भैंस) को खिला रहे हैं।

2. आंगनवाड़ियों की बदहाली
स्टाफ से बातचीत में स्पष्ट हुआ कि पोषण आहार की गुणवत्ता की निगरानी का कोई ठोस तंत्र नहीं है। ठेकेदारों द्वारा सप्लाई किया गया राशन केवल कागजों पर ‘पौष्टिक’ है, धरातल पर वह ‘अखाद्य’ साबित हो रहा है।

3. जानवरों का निवाला बनता ‘भविष्य’
पड़ताल में कई जगहों पर पैकेट खुले मिले और उनका आटा या दलिया जानवरों की नांद में पड़ा देखा गया। यानी जिस 8,000 करोड़ रुपये से बच्चों की हड्डियां मजबूत होनी थीं, उससे मवेशियों का पेट भरा जा रहा है।

सिस्टम की जवाबदेही कहाँ?
करोड़ों के बजट के बावजूद अगर 1.13 लाख बच्चे कुपोषित हैं, तो सवाल उठना लाजमी है:
क्या अधिकारियों को इस बात की खबर नहीं है कि सप्लाई किया जा रहा राशन घटिया है? क्या टेंडर प्रक्रिया में गुणवत्ता से अधिक कमीशन को प्राथमिकता दी जा रही है?”

कुपोषण केवल भोजन की कमी नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी का परिणाम है। महाराष्ट्र में बच्चों की मौतें केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उस व्यवस्था की नाकामी हैं जो 8,000 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी एक बच्चे को स्वादिष्ट और सुरक्षित भोजन नहीं दे पा रही। यदि राशन की गुणवत्ता में तत्काल सुधार नहीं किया गया, तो यह भारी-भरकम बजट केवल कागजी खानापूर्ति और जानवरों का चारा बनकर रह जाएगा।

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