देश में मातृत्व अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अब बच्चे की उम्र चाहे जो भी हो, उसे गोद लेने वाली हर महिला को 12 हफ्तों का मैटरनिटी लीव मिलना चाहिए। इस निर्णय को महिलाओं के अधिकारों और समानता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
अब तक लागू नियमों के अनुसार, केवल उन्हीं कामकाजी महिलाओं को 12 हफ्तों की मातृत्व अवकाश की सुविधा दी जाती थी, जो तीन महीने या उससे कम उम्र के बच्चे को गोद लेती थीं। ये प्रावधान 2020 के सोशल सिक्योरिटी कोड और मैटरनिटी बेनिफिट (संशोधन) अधिनियम, 2017 के तहत लागू था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को असमान और भेदभावपूर्ण मानते हुए निरस्त कर दिया है।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बच्चे की उम्र का उसकी देखभाल की जरूरतों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। जब कोई महिला किसी बच्चे को गोद लेती है, तो उसकी जिम्मेदारियां हर स्थिति में समान होती हैं, चाहे बच्चा छोटा हो या बड़ा। इसलिए उम्र के आधार पर मातृत्व अवकाश तय करना तर्कसंगत नहीं है और ये संविधान के तहत मिले समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
अदालत ने ये भी स्पष्ट किया कि जैसे ही कोई महिला कानूनी रूप से बच्चे को गोद लेती है या उसे बच्चा सौंपा जाता है, उसी दिन से उसे 12 हफ्तों की मैटरनिटी लीव का अधिकार मिल जाना चाहिए। ये व्यवस्था सभी गोद लेने वाली महिलाओं पर समान रूप से लागू होगी।
इस मामले की सुनवाई जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने की। अदालत ने अपने फैसले में केंद्र सरकार को ये सुझाव भी दिया कि पितृत्व अवकाश को भी एक सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए, ताकि बच्चे की परवरिश में दोनों माता-पिता की भूमिका को समान महत्व मिल सके।
ये फैसला 2021 में दायर एक जनहित याचिका के आधार पर आया है, जिसमें मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट की उस धारा को चुनौती दी गई थी, जो केवल तीन महीने तक के बच्चों को गोद लेने वाली महिलाओं को ही अवकाश का अधिकार देती थी। याचिकाकर्ता स्वयं दो बच्चों को गोद ले चुकी हैं और उन्होंने इस नियम को असमान बताया था।
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का ये निर्णय न केवल गोद लेने वाली माताओं को समान अधिकार प्रदान करेगा, बल्कि समाज में गोद लेने की प्रक्रिया को भी प्रोत्साहित करेगा। साथ ही यह कार्यस्थल पर लैंगिक समानता को मजबूत करने और बच्चों की बेहतर देखभाल सुनिश्चित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
इस फैसले के बाद अब केंद्र सरकार पर ये जिम्मेदारी होगी कि वह कानून और नीतियों में आवश्यक बदलाव कर इसे प्रभावी रूप से लागू करे। यह निर्णय भारतीय न्याय प्रणाली द्वारा सामाजिक न्याय और समानता को मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल के रूप में देखा जा रहा है।
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