नागपुर। दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपने शताब्दी वर्ष के बाद की यात्रा के लिए एक बड़े संगठनात्मक कायाकल्प (Restructuring) की तैयारी कर ली है। संघ के कार्य विस्तार, बेहतर समन्वय और जमीनी स्तर पर पकड़ मजबूत करने के लिए अब पुरानी ‘प्रांत रचना’ को बदलकर ‘संभाग रचना’ पर जोर दिया जा रहा है। इस नए बदलाव का सबसे बड़ा असर महाराष्ट्र और गुजरात जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में देखने को मिलेगा।
संभागों का विस्तार: 6 की जगह अब 8 केंद्र
नई योजना के तहत संघ ने अपने भौगोलिक और प्रशासनिक ढांचे को और अधिक सुदृढ़ करने का निर्णय लिया है।
* महाराष्ट्र और गुजरात: वर्तमान में इस क्षेत्र में 6 संभाग कार्य कर रहे हैं, जिन्हें बढ़ाकर अब 8 किया जाएगा।
* उद्देश्य: छोटे क्षेत्रों में बेहतर निगरानी और स्वयंसेवकों के साथ सीधा संवाद स्थापित करना।
नई कार्यकारी संरचना और भाजपा के साथ समन्वय
संघ अब प्रदेश स्तर पर नई कार्यकारिणी का गठन करने जा रहा है। यह कार्यकारिणी सीधे क्षेत्र स्तर के पदाधिकारियों के मार्गदर्शन में काम करेगी। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ समन्वय को लेकर है:
अब भाजपा में प्रचारकों को भेजने या प्रतिनियुक्ति (Deputation) का निर्णय पूरी तरह से क्षेत्र स्तर पर लिया जाएगा। इससे स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों और सांगठनिक जरूरतों के बीच बेहतर संतुलन बनेगा।
‘प्रांत’ से ‘संभाग’ की ओर: क्या है नया प्रस्ताव?
हरियाणा के समालखा में आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में इस क्रांतिकारी बदलाव का मसौदा तैयार किया गया है। प्रस्ताव की मुख्य बातें:
* पदनाम में बदलाव: अब ‘प्रांत प्रचारक’ के पारंपरिक पद के बजाय ‘संभाग प्रचारक’ नियुक्त किए जाएंगे।
* विकेंद्रीकरण: शक्तियों का विकेंद्रीकरण कर निचले स्तर के पदाधिकारियों को अधिक स्वायत्तता दी जाएगी।
* कार्य विस्तार: संघ का लक्ष्य हर बस्ती और हर गांव तक अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराना है, जिसके लिए छोटी इकाइयां (संभाग) अधिक कारगर साबित होंगी।
टाइमलाइन: कब से लागू होगा नया स्वरूप?
संघ के इस दूरगामी निर्णय पर मुहर लगाने और इसे जमीन पर उतारने के लिए एक स्पष्ट समय सीमा तय की गई है:
* अंतिम निर्णय: सितंबर 2026 में नागपुर में होने वाली प्रतिनिधि सभा में इस प्रस्ताव पर अंतिम मुहर लगेगी।
* पूर्ण कार्यान्वयन: जनवरी 2027 तक पूरे देश में इस नई रचना को लागू करने का लक्ष्य रखा गया है।
क्यों जरूरी है ये बदलाव?
संघ के 100 साल पूरे होने के बाद, बदलती सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में संगठन को और अधिक चुस्त-दुरुस्त बनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। संभाग स्तर पर ध्यान केंद्रित करने से न केवल सामाजिक समरसता के कार्यों में तेजी आएगी, बल्कि वैचारिक प्रसार भी अधिक सघन तरीके से हो सकेगा।
ये भी पढ़ें: मुंबई लोकल में ‘महा-राहत’: गुड़ी पड़वा पर पश्चिम रेलवे का तोहफा, 12 की जगह अब 15 डिब्बों की दौड़ेंगी ट्रेनें































