देश की राजधानी दिल्ली स्थित विश्व प्रसिद्ध स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर में एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक क्षण का साक्षी बना, जहां तपोमूर्ति श्रीनीलकंठवर्णी (भगवान स्वामीनारायण) की 108 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा विधिवत संपन्न की गई। इस आयोजन ने न केवल धार्मिक महत्व को उजागर किया, बल्कि वैश्विक स्तर पर शांति, करुणा और मानवता के संदेश को भी सशक्त रूप से प्रस्तुत किया।
इस भव्य समारोह का नेतृत्व महंत स्वामी महाराज ने किया, जो BAPS स्वामीनारायण संस्था के प्रमुख हैं। वैदिक मंत्रोच्चार और षोडशोपचार पूजन विधि के साथ संपन्न हुए इस अनुष्ठान में भारत सहित अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया से 300 से अधिक संत और महंत उपस्थित रहे।

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इस प्रतिमा की खासियत ये है कि इसे पंचधातु से तैयार किया गया है और ये एक ही चरण में निर्मित विश्व की पहली इतनी विशाल प्रतिमा मानी जा रही है, जो भगवान के कठिन तप और आध्यात्मिक साधना को दर्शाती है। करीब एक वर्ष के समय में तैयार हुई इस मूर्ति को 8 फीट ऊंचे पृष्ठतल पर स्थापित किया गया है। इसके निर्माण में कांस्य धातु का विशेष उपयोग किया गया और लगभग 50 कारीगरों, संतों और स्वयंसेवकों ने मिलकर इसे साकार रूप दिया।
ये प्रतिमा उस ऐतिहासिक तपस्या का प्रतीक है, जब श्रीनीलकंठवर्णी ने हिमालय क्षेत्र के पुलहाश्रम (मुक्तिनाथ) में एक पैर पर खड़े होकर कई महीनों तक कठोर साधना की थी। इस दिव्य रूप के माध्यम से समाज में तप, त्याग, करुणा, मैत्री, मानव सेवा और भक्ति जैसे मूल्यों को स्थापित करने का संदेश दिया गया है।

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कार्यक्रम की शुरुआत एक दिन पहले ‘विश्व शांति महायज्ञ’ से हुई थी, जिसमें वैदिक अनुष्ठानों के जरिए वैश्विक कल्याण की कामना की गई। इस अवसर पर महंत स्वामी महाराज ने विश्वभर में शांति, एकता और युद्धों के अंत की प्रार्थना की। उन्होंने सद्भाव और मैत्रीपूर्ण संबंधों का संदेश देते हुए सफेद कबूतर उड़ाकर विश्व शांति का प्रतीकात्मक आह्वान भी किया।

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यदि श्रीनीलकंठवर्णी के जीवन पर नजर डालें, तो ये प्रेरणादायक यात्रा और भी अद्भुत बन जाती है। मात्र 11 वर्ष की आयु में उन्होंने घर-परिवार त्याग दिया और अगले सात वर्षों तक पूरे भारत में आध्यात्मिक यात्रा की। इस दौरान उन्होंने 12 हजार किलोमीटर से अधिक दूरी तय की और हिमालय, बद्रीनाथ-केदारनाथ, कैलाश-मानसरोवर, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम और द्वारका जैसे प्रमुख तीर्थों की यात्रा की। इसी दौरान उन्होंने ‘नीलकंठ वर्णी’ नाम धारण किया।
दिल्ली के अक्षरधाम में स्थापित ये विशाल प्रतिमा अब न केवल श्रद्धा का केंद्र बनेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को आध्यात्मिकता, त्याग और मानवता के मूल्यों से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम भी साबित होगी।
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