भारत को एक डिजिटल सुपरपावर बनाने की सरकार की महत्वाकांक्षी घोषणाएं अब संसदीय जांच के घेरे में हैं। सूचना प्रौद्योगिकी (IT) मंत्रालय के बजटीय आवंटन पर संसदीय स्थायी समिति की हालिया रिपोर्ट ने सरकार के डिजिटल मिशन की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि डिजिटल इंडिया का सपना केवल फंड की कमी से नहीं, बल्कि प्रशासनिक जटिलताओं और कार्यप्रणाली में दूरदर्शिता के अभाव के कारण पिछड़ रहा है।
बजट की कैंची: मांग और आवंटन का अंतर
रिपोर्ट के अनुसार, आईटी मंत्रालय ने अपनी विभिन्न परियोजनाओं और परिचालन जरूरतों के लिए 23,000 करोड़ रुपये से अधिक के बजट की मांग की थी। हालांकि, वित्त मंत्रालय ने इस मांग पर कैंची चलाते हुए मात्र 17,768 करोड़ रुपये ही आवंटित किए। समिति ने पाया कि यह कटौती मंत्रालय के कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स की गति को धीमा कर सकती है।
सेमीकंडक्टर मिशन: सबसे बड़ा झटका
सरकार के सबसे महत्वाकांक्षी ‘सेमीकंडक्टर मिशन’ को लेकर समिति ने कड़ी चिंता जताई है। भारत को वैश्विक चिप निर्माण केंद्र बनाने का लक्ष्य अब संकट में नजर आ रहा है:
* प्रोजेक्ट्स में देरी: चिप निर्माण के कई बड़े प्रोजेक्ट्स अब तक फाइलों और कागजी समझौतों से बाहर नहीं निकल पाए हैं।
* जटिल शर्तें: समिति ने पाया कि सेमीकंडक्टर मिशन के तहत निवेश के लिए जो शर्तें रखी गई हैं, वे इतनी जटिल हैं कि वैश्विक कंपनियां और निवेशक हिचकिचा रहे हैं।
* जमीनी हकीकत: रिपोर्ट में कहा गया है कि चिप निर्माण की “बड़ी घोषणाओं” और “जमीनी हकीकत” के बीच एक गहरी खाई बन गई है।
काम करने का तरीका बना बाधा
संसदीय समिति ने कड़े शब्दों में कहा है कि डिजिटल इंडिया के पिछड़ने के पीछे केवल पैसा ही कारण नहीं है। रिपोर्ट के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
* प्रशासनिक सुस्ती: योजनाओं को लागू करने के तौर-तरीके पुराने और नौकरशाही के बोझ तले दबे हुए हैं।
* अनुपयोगी फंड: कई बार आवंटित फंड का सही समय पर और पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता, जिससे अगले साल के बजट में कटौती होती है।
* जटिल नीतियां: डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी विकास के लिए बनाई गई नीतियां व्यवहारिक होने के बजाय कागजों पर अधिक जटिल हैं।
समिति का सुझाव: नीतिगत बदलाव जरूरी
समिति ने सिफारिश की है कि सरकार को केवल आवंटन पर ध्यान देने के बजाय ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ (Ease of Doing Business) को आईटी सेक्टर में गंभीरता से लागू करना चाहिए। सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक मिशनों के लिए शर्तों को लचीला बनाने और एक सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
संसदीय स्थायी समिति की यह रिपोर्ट सरकार के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ की तरह है। यदि भारत को वाकई 2026-27 तक तकनीकी मोर्चे पर आत्मनिर्भर बनना है, तो उसे फंड के साथ-साथ अपनी कार्यप्रणाली और नीतिगत ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे।































