गढ़चिरौली जिले के अहेरी क्षेत्र में तैनात एडिशनल कलेक्टर विजय भाकरे पिछले 17 महीनों से बिना किसी सरकारी वाहन के काम कर रहे हैं। उनकी ड्यूटी के लिए एक गाड़ी अनिवार्य होनी चाहिए, लेकिन सरकारी गाड़ी न मिलने के कारण वे अपनी पुरानी रेंजर साइकिल से ही यात्रा करने को मजबूर हैं।
साइकिल से गांव-गांव तक पहुंच रहे अधिकारी
गढ़चिरौली जिला, खासकर उसका दक्षिणी भाग, नक्सल प्रभावित इलाका माना जाता है। यहां अहेरी, सिरोंचा, एटापल्ली, भामरागड और मुलचेरा जैसे पांच तालुके आते हैं, जिनमें लगभग 900 गांव बसे हुए हैं। इन गांवों का दौरा करने के लिए वाहन होना जरूरी है, लेकिन भाकरे कभी किसी की बाइक, कभी किसी की कार तो कभी साइकिल से सफर कर रहे हैं। वे अपने कर्तव्य को निभाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं, चाहे साधन कुछ भी हो।
चुनाव के दौरान भी साइकिल से पहुंचे मतदान केंद्र
पिछले हफ्ते अहेरी में नगर परिषद चुनाव के दौरान, विजय भाकरे ने मतदान केंद्र तक पहुंचने के लिए 5 किलोमीटर तक साइकिल चलाई। उनकी इस सादगी और संघर्ष को देखकर वहां मौजूद लोग हैरान रह गए। वर्तमान में वे चार तालुकों और 900 से अधिक गांवों की देखरेख कर रहे हैं।
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पुरानी गाड़ी से आई परेशानी, अब तक नहीं मिला नया वाहन
विजय भाकरे को 7 अगस्त 2023 को अहेरी में नियुक्त किया गया था। शुरुआत में वे एक 2012 मॉडल की पुरानी फिएट कार का इस्तेमाल कर रहे थे, लेकिन वो गाड़ी इतनी खराब थी कि दक्षिण गढ़चिरौली के कठिन रास्तों पर चलाना मुश्किल हो गया। अंततः जनवरी में आरटीओ ने उस गाड़ी को रद्द कर दिया। इसके बाद उन्होंने कई बार नए वाहन की मांग की, लेकिन कोई समाधान नहीं मिला। तब से वे अपनी ड्यूटी पूरी करने के लिए साइकिल, नाव और पैदल यात्रा का सहारा ले रहे हैं।
गढ़चिरौली में काम करना एक चुनौती
गढ़चिरौली जिला माओवादी गतिविधियों के कारण पहले ही एक कठिन कार्यक्षेत्र माना जाता है। यहां सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी है। ऐसे इलाके में एक सरकारी अधिकारी को बिना किसी उचित साधन के काम करना सरकार की व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े करता है।
सरकार को लेना चाहिए संज्ञान
गौरतलब है कि अहेरी एडिशनल कलेक्टर का पद 2010 में बनाया गया था, ताकि इस क्षेत्र के विकास को गति दी जा सके। आज जब दक्षिण गढ़चिरौली में खनन कार्य तेजी से बढ़ रहा है, तब इस पद पर कार्यरत अधिकारी को उचित संसाधन उपलब्ध कराना आवश्यक है। विजय भाकरे अपने निजी पैसों से कभी किराए की गाड़ी तो कभी किसी और की गाड़ी से सफर कर रहे हैं, जो किसी भी सरकारी अधिकारी के लिए बेहद असामान्य स्थिति है।
ऐसे में ये कहना शायद गलत नहीं, कि सरकार को जल्द से जल्द इस मामले पर संज्ञान लेना चाहिए, ताकि एक वरिष्ठ अधिकारी को बुनियादी सुविधाओं के अभाव में संघर्ष न करना पड़े।
संवादाता – राहुल शुक्ला
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