नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के बादलों ने अब भारत के ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स सेक्टर के सामने एक नया संकट खड़ा कर दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग में गैस क्षेत्रों को निशाना बनाए जाने के कारण टेक्निकल ग्रेड यूरिया (TGU) की वैश्विक आपूर्ति बाधित हो गई है। इसका सीधा असर भारत में दिखने लगा है, जहाँ पिछले एक महीने में इसकी कीमतों में 44% की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
BS-6 वाहनों के लिए क्यों जरूरी है TGU?
आधुनिक BS-6 (Bharat Stage VI) इंजन वाले वाहनों, विशेषकर ट्रकों और बसों में प्रदूषण कम करने के लिए डीजल एग्जॉस्ट फ्लुइड (DEF) यानी ‘एडब्लू’ (AdBlue) का उपयोग किया जाता है। इस फ्लुइड को बनाने के लिए 99% टेक्निकल ग्रेड यूरिया की आवश्यकता होती है। यदि वाहन में DEF खत्म हो जाए या इसकी गुणवत्ता खराब हो, तो इंजन की कार्यक्षमता गिर जाती है और वाहन ‘लिम्प मोड’ (Limp Mode) में चला जाता है, जिससे उसकी गति और शक्ति बेहद कम हो जाती है।
आयात पर निर्भरता बनी गले की हड्डी
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% से 88% टीजीयू (TGU) आयात करता है। इस आयात का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों (Middle East) से आता है। युद्ध के कारण इन क्षेत्रों से आपूर्ति शृंखला (Supply Chain) टूटने की कगार पर है। आंकड़ों के अनुसार:
* वैश्विक कीमतों में वृद्धि: टीजीयू के भाव 484 डॉलर (करीब 45,356 रुपये) से बढ़कर अब 695 डॉलर (करीब 65,128 रुपये) प्रति टन पर पहुंच गए हैं।
* घरेलू खपत: भारत सालाना लगभग 15 से 17 लाख टन टीजीयू की खपत करता है, जबकि हमारा घरेलू उत्पादन काफी सीमित है।
ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर वित्तीय बोझ
कीमतों में इस उछाल का सबसे बड़ा असर माल ढुलाई और सार्वजनिक परिवहन पर पड़ेगा। एक अनुमान के मुताबिक:
* ट्रक: एक भारी ट्रक को साल भर में लगभग 3,000 लीटर यूरिया (DEF) की आवश्यकता होती है।
* बस: एक बस सालाना करीब 2,000 लीटर यूरिया की खपत करती है।
* कारें: BS-6 डीजल कारों में हर 800 से 1,000 किलोमीटर चलने पर लगभग 1 लीटर DEF की जरूरत होती है।
कीमतों में 44% की वृद्धि का मतलब है कि ट्रांसपोर्टरों की परिचालन लागत (Operating Cost) में भारी इजाफा होगा, जिसका अंतिम बोझ आम जनता पर महंगाई के रूप में पड़ सकता है।
विशेषज्ञों की चिंता
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खाड़ी देशों में तनाव जल्द कम नहीं हुआ, तो भारत में DEF की किल्लत भी हो सकती है। फिलहाल स्टॉक मौजूद है, लेकिन नई खेप के महंगे होने से ट्रांसपोर्ट सेक्टर में बेचैनी साफ देखी जा सकती है। सरकार को अब घरेलू स्तर पर टीजीयू के उत्पादन को बढ़ाने या वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों पर विचार करने की सख्त जरूरत है।































