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लोकतंत्र के ‘अंपायर’ पर प्रहार: मुख्य निर्वाचन आयुक्त Gyanesh Kumar को हटाने की तैयारी में विपक्ष, संसद में पहली बार पेश हो सकता है ऐसा प्रस्ताव

Gyanesh Kumar
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भारतीय राजनीति में एक ऐसा अध्याय जुड़ने जा रहा है जो इससे पहले कभी नहीं देखा गया। विपक्षी दल (INDIA गठबंधन) मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार (Gyanesh Kumar) को पद से हटाने के लिए संसद में एक औपचारिक प्रस्ताव लाने की तैयारी में हैं। यदि यह प्रस्ताव सदन के पटल पर रखा जाता है, तो यह देश के इतिहास में किसी मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ लाया जाने वाला पहला निष्कासन प्रस्ताव होगा।

विपक्ष की घेराबंदी: मसौदा तैयार, इसी हफ्ते दस्तक!
सूत्रों के अनुसार, विपक्षी दलों ने नोटिस का मसौदा (Draft) पूरी तरह तैयार कर लिया है। इस मुहिम का नेतृत्व मुख्य रूप से तृणमूल कांग्रेस (TMC) और कांग्रेस कर रहे हैं।

एकजुट विपक्ष: टीएमसी के एक सांसद ने पुष्टि की है कि इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दल भी इस नोटिस का पुरजोर समर्थन करेंगे।

ममता बनर्जी का कड़ा रुख: इस विवाद की जड़ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का वह बयान है, जिसमें उन्होंने राज्य में मतदाताओं के नाम काटे जाने और SIR (Special Investigation Report) के मुद्दे पर चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे। उन्होंने स्पष्ट तौर पर ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग की थी।

क्यों उठ रही है हटाने की मांग? (मुख्य आरोप)
विपक्ष के इस कड़े कदम के पीछे कई गंभीर आरोप और चिंताएं हैं:
मतदाता सूची में गड़बड़ी: बंगाल सहित कई राज्यों में विपक्षी समर्थकों के नाम सूची से हटाए जाने का आरोप।
संवैधानिक निष्पक्षता पर सवाल: विपक्ष का मानना है कि वर्तमान चुनाव आयोग सत्तारूढ़ दल के प्रति नरम रुख अपना रहा है।
प्रशासनिक हस्तक्षेप: एसआईआर (SIR) के मुद्दे पर राज्य सरकारों के अधिकारों में हस्तक्षेप का दावा।

क्या है संवैधानिक प्रक्रिया? (Article 324)
मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाना कोई आसान प्रक्रिया नहीं है। भारत के संविधान के अनुसार:
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान: CEC को केवल उसी प्रक्रिया और आधार पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को।
कदाचार या अक्षमता: उन्हें हटाने के लिए ‘सिद्ध कदाचार’ (Proven Misbehaviour) या ‘अक्षमता’ का आधार होना अनिवार्य है।
संसद की मंजूरी: संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में विशेष बहुमत (उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3 और कुल सदस्यता का बहुमत) से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है।

ऐतिहासिक संदर्भ: पहली बार ऐसी चुनौती
आज तक भारत में किसी भी CEC को इस तरह के प्रस्ताव के जरिए नहीं हटाया गया है। इससे पहले टी.एन. शेषन जैसे आयुक्तों के समय भी टकराव हुए, लेकिन बात कभी संसद में निष्कासन प्रस्ताव तक नहीं पहुंची। ज्ञानेश कुमार के खिलाफ यह कदम संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और राजनीतिक जवाबदेही के बीच एक बड़ी जंग का संकेत है।

विपक्ष का यह कदम केवल एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर एक ‘अविश्वास’ व्यक्त करने जैसा है। यदि यह नोटिस संसद में आता है, तो आने वाले दिनों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस और संवैधानिक संकट जैसी स्थिति देखने को मिल सकती है। लोकतंत्र के इस ‘अंपायर’ के भविष्य का फैसला अब संसद की दहलीज पर है।

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