महाराष्ट्र

बारामती उपचुनाव: ‘निर्विरोध’ की उम्मीदें धराशायी, सुनेत्रा पवार के सामने कांग्रेस और निर्दलीयों की घेराबंदी

सुनेत्रा पवार
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बारामती, जो दशकों से पवार परिवार का अभेद्य दुर्ग रहा है, आज एक भावुक और राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है। पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार के निधन के बाद खाली हुई इस सीट पर सबकी नजरें टिकी थीं। शुरुआती कयास थे कि अजित दादा के सम्मान में यह चुनाव निर्विरोध होगा, लेकिन नामांकन की प्रक्रिया शुरू होते ही तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। अब यह सीट महाराष्ट्र की सबसे चर्चित चुनावी जंग में तब्दील हो गई है।

1. सुनेत्रा पवार बनाम 19 उम्मीदवार: निर्विरोध की राह में रोड़े
राकांपा (अजित गुट) ने अपनी कमान उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार को सौंपते हुए उन्हें मैदान में उतारा है। महायुति को उम्मीद थी कि सहानुभूति की लहर के बीच विपक्षी दल उम्मीदवार नहीं उतारेंगे। हालांकि, अब तक 19 उम्मीदवारों द्वारा नामांकन दाखिल करना यह साफ करता है कि राह उतनी आसान नहीं है। लोकतंत्र की इस लड़ाई में कई निर्दलीय और छोटे दलों ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है।

2. कांग्रेस का बड़ा दांव: एडवोकेट आकाश मोरे मैदान में
इस उपचुनाव में सबसे चौंकाने वाला मोड़ कांग्रेस ने दिया है। कांग्रेस ने पूर्व विधायक विश्वनाथ मोरे के पुत्र एडवोकेट आकाश मोरे को अपना उम्मीदवार घोषित कर चुनावी मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है।

* रणनीति: प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल की मौजूदगी में सोमवार को होने वाला मोरे का नामांकन शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है।
* विपक्ष की फूट: जहां कांग्रेस ने ताल ठोक दी है, वहीं महाविकास अघाड़ी के अन्य साथी—शिवसेना (उद्धव गुट) और राकांपा (शरद पवार गुट)—ने इस सीट से दूर रहने का फैसला किया है। यह ‘वेट एंड वॉच’ की नीति है या पवार परिवार के प्रति सम्मान, यह चर्चा का विषय बना हुआ है।

3. समीकरण बिगाड़ेंगे ओबीसी नेता और आरएसपी
बारामती की इस चुनावी जंग में दो और महत्वपूर्ण कारक जुड़ गए हैं:

* लक्ष्मण हाके की एंट्री: प्रमुख ओबीसी नेता लक्ष्मण हाके द्वारा सोमवार को नामांकन भरने की संभावना ने जातीय समीकरणों को गरमा दिया है। यदि वे चुनाव लड़ते हैं, तो ओबीसी मतों का ध्रुवीकरण तय है।
* महादेव जानकर का समर्थन: राष्ट्रीय समाज पार्टी (RSP) के प्रमुख महादेव जानकर ने कांग्रेस उम्मीदवार आकाश मोरे को समर्थन देने का ऐलान किया है। जानकर का धनगर समाज में गहरा प्रभाव है, जो इस चुनाव के नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

4. विरासत की साख का सवाल
सुनेत्रा पवार के लिए यह चुनाव केवल एक सीट जीतने का नहीं, बल्कि अजित पवार की विरासत को आगे बढ़ाने और क्षेत्र में अपनी पकड़ साबित करने का है। वहीं, कांग्रेस और अन्य निर्दलीय उम्मीदवारों की उपस्थिति ने इसे एक ऐसी चुनौती बना दिया है जहां हर एक वोट की कीमत बढ़ गई है।

सोमवार का दिन होगा निर्णायक
सोमवार को होने वाले नामांकनों के बाद बारामती का सियासी पारा अपने चरम पर होगा। एक तरफ सत्ता का रसूख और सहानुभूति की लहर है, तो दूसरी तरफ विपक्ष की घेराबंदी और जातीय समीकरणों की बिसात। देखना होगा कि बारामती की जनता ‘दादा’ की विरासत पर मुहर लगाती है या बदलाव के लिए नया चेहरा चुनती है।

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