महाराष्ट्र

ठाकरे बंधुओं को बड़ा झटका, बेस्ट चुनाव में नहीं मिली एक भी सीट

बेस्ट चुनाव
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महाराष्ट्र की राजनीति में जब उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के एक साथ आने की खबर सामने आई थी, तब राजनीतिक गलियारों में कयास लगाए जा रहे थे कि ये गठबंधन राज्य की सियासत में नया समीकरण गढ़ेगा। लेकिन 20 साल बाद पहली बार साथ आए ठाकरे बंधुओं को बेस्ट चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा।

फडणवीस का तंज, ‘ठाकरे ब्रांड’ को जनता ने नकारा
सीएम देवेंद्र फडणवीस ने इस हार को ठाकरे बंधुओं के लिए बड़ा सबक बताया। उन्होंने कहा, “ये नतीजे ठाकरे ब्रांड की सार्वजनिक अस्वीकृति को दिखाते हैं। दरअसल, ये सिर्फ एक ऋण समिति का चुनाव था, लेकिन इसे राजनीतिक रंग देकर बड़ी जीत का दावा किया गया। जनता को ये पसंद नहीं आया और परिणाम साफ है।”

ठाकरे पैनल हुआ साफ
उद्धव और राज ठाकरे का उत्कर्ष पैनल चुनाव में एक भी सीट हासिल नहीं कर पाया। माना जा रहा था कि उनका मुकाबला महायुति के सहकार समृद्धि पैनल से होगा, लेकिन बाजी मार ली शशांक राव पैनल ने। इस पैनल ने 14 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की, जबकि महायुति को सिर्फ 7 सीटें मिलीं।

आधी रात को बदले नतीजे
शुरुआती गणना में महायुति को 9 सीटें मिलती दिखीं, लेकिन देर रात हुई दोबारा गिनती में शशांक राव पैनल के दो और उम्मीदवार विजयी हो गए और सत्ता समीकरण बदल गया। पिछले 9 सालों से बेस्ट पर ठाकरे गुट का दबदबा था, लेकिन इस बार समीकरण पूरी तरह उलट गया।

लिटमस टेस्ट में फेल हुए ठाकरे भाई
ये चुनाव उद्धव और राज ठाकरे की नयी जोड़ी के लिए एक तरह का लिटमस टेस्ट माना जा रहा था। लेकिन शून्य सीटों ने साफ कर दिया कि मतदाताओं ने ठाकरे बंधुओं को नकार दिया है। आने वाले बीएमसी चुनाव से पहले ये नतीजा दोनों के लिए बड़ी चिंता का विषय है।

क्यों जीता शशांक राव पैनल?
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, शशांक राव पैनल की जीत का राज उनकी वर्षों से मजदूर संगठनों से नजदीकी और कर्मचारियों के मुद्दों पर सक्रियता है। लगातार आंदोलनों में भागीदारी और बेस्ट कर्मचारियों की आवाज उठाने से उन्हें भरोसा और समर्थन मिला।

ठाकरे ब्रांड का ढलता प्रभाव
बालासाहेब ठाकरे के जमाने से बेस्ट समिति पर ठाकरे परिवार का दबदबा रहा है। लेकिन इस बार का चुनाव संकेत देता है कि मराठी मानुष भी अब ठाकरे परिवार से दूरी बना रहे हैं। ये नतीजे आने वाले बीएमसी चुनावों पर सीधा असर डाल सकते हैं।

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