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महाराष्ट्र में ‘ऑपरेशन टाइगर’ पर ब्रेक: शिंदे की विस्तारवादी नीति को भाजपा का ‘चेक-मेट’, क्या बढ़ रही है महायुति में रार?

ऑपरेशन टाइगर
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महाराष्ट्र की सियासत में इन दिनों एक नया शब्द गूंज रहा है— ‘ऑपरेशन टाइगर’। चर्चा थी कि मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे अपनी ताकत बढ़ाने के लिए विपक्षी खेमे में बड़ी सेंधमारी की तैयारी कर चुके हैं। लेकिन, दिल्ली दरबार की हालिया हलचल के बाद जो खबरें छनकर बाहर आ रही हैं, वे कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं। सूत्रों का दावा है कि भाजपा ने शिंदे के इस ‘विस्तारवादी’ अभियान पर फिलहाल ब्रेक लगा दिया है।

क्या था शिंदे का ‘ऑपरेशन टाइगर’?
मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने पिछले दिनों दिल्ली का दौरा कर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से लंबी मुलाकात की थी। इस दौरे के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई कि शिंदे राज्य में ‘ऑपरेशन टाइगर’ चलाने जा रहे हैं।

* लक्ष्य: शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसद और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) के 6 सांसदों को अपने गुट में शामिल करना।
* उद्देश्य: आगामी चुनावों से पहले अपनी पार्टी की सौदेबाजी की शक्ति (Bargaining Power) को बढ़ाना और खुद को राज्य के असली ‘हिंदुत्व’ चेहरे के रूप में स्थापित करना।

भाजपा ने क्यों लगाया ‘ब्रेक’?
सूत्रों की मानें तो अमित शाह के साथ हुई बैठक में भाजपा ने इस योजना पर अपनी असहमति जता दी है। भाजपा के इस ‘ब्रेक’ के पीछे कई रणनीतिक कारण बताए जा रहे हैं:

* गठबंधन का संतुलन: भाजपा को डर है कि यदि शिंदे का गुट बहुत अधिक शक्तिशाली हो गया, तो महायुति (BJP, शिंदे सेना, अजित पवार गुट) के भीतर सीटों के बंटवारे में भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
* कानूनी पेचीदगियां: दल-बदल कानून के तहत सांसदों को तोड़ना एक लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया है, जिससे चुनाव से ठीक पहले गठबंधन की छवि पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
* सहानुभूति की लहर: भाजपा का एक धड़ा मानता है कि शरद पवार और उद्धव ठाकरे के सांसदों को बार-बार तोड़ने से जनता के बीच उनके प्रति ‘सहानुभूति’ बढ़ सकती है, जो चुनाव में भारी पड़ सकती है।

आगे क्या? सियासत के दो संभावित रास्ते
अब सवाल यह है कि क्या एकनाथ शिंदे भाजपा के इस फैसले को चुपचाप स्वीकार कर लेंगे?

* रास्ता 1 (समझौता): शिंदे अपने अभियान को धीमा कर सकते हैं और भाजपा द्वारा तय की गई सीटों की संख्या पर राजी हो सकते हैं।
* रास्ता 2 (अघोषित जंग): शिंदे गुट पर्दे के पीछे से अपनी सक्रियता जारी रख सकता है, जिससे महायुति के भीतर ‘अंतर्कलह’ बढ़ने की संभावना है।

वर्चस्व की लड़ाई
महाराष्ट्र की राजनीति अब ‘नीति’ से ज्यादा ‘रणनीति’ पर टिकी है। भाजपा ने ‘ऑपरेशन टाइगर’ पर ब्रेक लगाकर यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि रिमोट कंट्रोल अभी भी दिल्ली के पास है। एकनाथ शिंदे के लिए यह अपनी ताकत दिखाने का मौका था, जिसे फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।

क्या यह ब्रेक केवल अस्थाई है या भाजपा और शिंदे के बीच विश्वास की कमी की शुरुआत? महाराष्ट्र की जनता की नजरें अब अगले घटनाक्रम पर टिकी हैं।

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