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Budget Session 2026: संसद की गरिमा पर ‘स्पीकर’ की दो टूक: ओम बिरला ने सांसदों को लिखा पत्र; बोले- ‘तख्तियां और अमर्यादित व्यवहार लोकतंत्र के लिए चिंताजनक’

Om Birla
Om Birla

Budget Session 2026: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संसद की प्रतिष्ठा को अक्षुण्ण रखने के लिए एक बड़ा कदम उठाते हुए सभी लोकसभा सांसदों को पत्र लिखकर ‘गंभीर आत्ममंथन’ करने का आह्वान किया है। प्रधानमंत्री द्वारा स्पीकर के प्रति समर्थन जताए जाने के ठीक बाद आए इस पत्र में ओम बिरला ने सांसदों को याद दिलाया है कि उनका आचरण केवल सदन तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे पूरा देश देख रहा है।

140 करोड़ भारतीयों की ‘साझा जिम्मेदारी’
ओम बिरला ने अपने पत्र की शुरुआत में सांसदों को उनके पद की गरिमा और जनादेश की ताकत का बोध कराया। उन्होंने लिखा: हमारी संसद में व्यक्त होने वाली हर आवाज 140 करोड़ लोगों की आशाओं, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है। मैं यह पत्र लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति हमारी साझा जिम्मेदारी की भावना से लिख रहा हूं।

संसदीय आचरण पर गंभीर सवाल
पिछले कुछ सत्रों के दौरान सदन में हुई अभूतपूर्व हंगामेबाजी और विरोध के तरीकों पर अध्यक्ष ने सीधी और कड़ी टिप्पणी की है। उन्होंने पत्र में मुख्य रूप से तीन बिंदुओं पर गहरी चिंता जताई:

  • बैनर और तख्तियों का प्रदर्शन: सदन के भीतर प्लेकार्ड और बैनर लहराना संसदीय नियमों के विरुद्ध है, जिसे स्पीकर ने लोकतंत्र की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने वाला बताया।
  • अमर्यादित भाषा: चर्चा के दौरान इस्तेमाल किए जा रहे शब्दों के गिरते स्तर पर उन्होंने कड़ा ऐतराज जताया है।
  • परिसर के बाहर व्यवहार: पत्र में न केवल सदन के अंदर, बल्कि संसद परिसर के बाहर भी सांसदों के आचरण को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

समय की मांग: गंभीर आत्ममंथन
ओम बिरला ने सभी दलों के नेताओं से आग्रह किया है कि वे केवल विरोध के लिए विरोध न करें, बल्कि उच्च नैतिक आचरण का उदाहरण पेश करें।

स्पीकर के पत्र की मुख्य बातें संदेश और प्रभाव
गंभीर आत्ममंथन सांसदों को अपने व्यवहार और लोकतांत्रिक मूल्यों पर विचार करने की जरूरत है।

नैतिक उत्तरदायित्व सभी दलों के नेताओं को अपने सदस्यों का व्यवहार सुनिश्चित करना होगा।
सार्वजनिक छवि देश की जनता सांसदों के आचरण से ही लोकतंत्र का आंकलन करती है।

लोकतंत्र का मंदिर और हमारी शुचिता
लोकसभा अध्यक्ष का यह पत्र एक अभिभावक की उस चेतावनी की तरह है, जो परिवार की प्रतिष्ठा बचाने के लिए दी जाती है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि संसद केवल बहस का केंद्र नहीं, बल्कि देश की गरिमा का प्रतीक है। अब गेंद राजनीतिक दलों और सांसदों के पाले में है कि वे इस ‘विनम्र आग्रह’ को कितनी गंभीरता से लेते हैं और आने वाले सत्रों में संसद की गरिमा को बहाल करने में क्या भूमिका निभाते हैं।

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