महानगर: सरकार के तमाम दावों और आश्वासनों की जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। महानगर में रसोई गैस (LPG) की भारी किल्लत ने अब एक ‘मानवीय संकट’ का रूप ले लिया है। घरेलू उपभोक्ता जहाँ एक अदद सिलेंडर के लिए गैस एजेंसियों के चक्कर काटकर थक चुके हैं, वहीं कमर्शियल गैस की अनुपलब्धता ने शहर के खान-पान उद्योग की कमर तोड़ दी है।
सूने पड़े किचन, छिन रहा रोजगार
गैस आपूर्ति में आई इस बाधा का सबसे भयावह असर छोटे और मध्यम श्रेणी के होटलों व रेस्टोरेंट पर पड़ा है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, महानगर के 30 प्रतिशत से अधिक होटल और रेस्टोरेंट बंद हो चुके हैं। यह केवल व्यवसाय का नुकसान नहीं है, बल्कि उन हजारों परिवारों पर चोट है जिनका गुजारा इन चूल्हों के जलने से होता था।
बेबस मालिक, पलायन को मजबूर कर्मचारी
होटल मालिकों के सामने अब अपने कर्मचारियों को खिलाने का संकट खड़ा हो गया है। जब व्यावसायिक सिलेंडर ही उपलब्ध नहीं हैं, तो होटल चलाना नामुमकिन हो गया है।
केस स्टडी 1: ‘गुड लुक रेस्टोरेंट एंड होटल’ के मैनेजर अशोक ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया, “हमारे पास 60 लोगों का स्टाफ है। हमें उनके भविष्य की चिंता है। जब होटल में खाना पकाने के लिए गैस ही नहीं है, तो हम अपने स्टाफ को खाना कैसे खिलाएं? स्थिति अत्यंत दयनीय है।”
केस स्टडी 2: ‘रेड चिल्ली रेस्टोरेंट’ के संतोष पाटील की कहानी भी अलग नहीं है। उनके दोनों रेस्टोरेंट बंद हो चुके हैं। उन्होंने बताया कि आधा स्टाफ पहले ही गांव लौट चुका है। यदि अगले कुछ दिनों में आपूर्ति सामान्य नहीं हुई, तो बाकी बचे कर्मचारियों को भी घर भेजना पड़ेगा।
अर्थव्यवस्था पर दोहरी मार
एक तरफ गैस सिलेंडर की कीमतें और उनकी कमी आम जनता को परेशान कर रही है, वहीं दूसरी तरफ होटल उद्योग के बंद होने से ‘रिवर्स माइग्रेशन’ (शहर से गांव की ओर पलायन) शुरू हो गया है। फास्ट फूड स्टॉल और छोटे ढाबे चलाने वाले लोग अब सड़कों पर आ गए हैं। वितरक एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें और लोगों का आक्रोश यह बताने के लिए काफी है कि प्रशासन की व्यवस्थाएं पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी हैं।
संकट के मुख्य बिंदु:
घरेलू उपभोक्ता: बुकिंग के हफ्तों बाद भी डिलीवरी का इंतजार।
कमर्शियल सप्लाई: जरूरत का 20% हिस्सा भी बाजार में उपलब्ध नहीं।
पलायन: काम बंद होने के डर से कारीगरों और वेटर्स का अपने गांवों की ओर रुख।
बंद इकाइयां: महानगर के लगभग हर तीसरे छोटे रेस्टोरेंट में लटका ताला।
सरकार को केवल आश्वासन देने के बजाय अब युद्ध स्तर पर गैस की आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी। यदि समय रहते कमर्शियल सिलेंडरों की किल्लत दूर नहीं की गई, तो यह पलायन महानगर की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका साबित होगा।
ये भी पढ़ें: BMC के खजाने पर ‘सरकारी’ ब्रेक: राज्य सरकार पर 10,931 करोड़ का बकाया, विकास परियोजनाओं की रफ्तार पर टिकी नजरें






























