देवउठनी एकादशी: कार्तिक मास की शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी का पर्व आज पूरे देश में धूमधाम से मनाया जा रहा है। इस दिन भगवान विष्णु चार माह के योगनिद्रा से जागते हैं और सृष्टि का संचालन पुनः शुरू करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी पावन अवसर पर एक ऐसी नदी की पूजा भी की जाती है, जिसमें पत्थर के रूप में शापग्रस्त भगवान विष्णु स्वयं विराजमान हैं? जी हां, हम बात कर रहे हैं नेपाल की पवित्र गंडकी नदी और उसमें मिलने वाले शालिग्राम शिला की, जिन्हें भगवान विष्णु का जीवंत स्वरूप माना जाता है।
गंडकी नदी में बहती है भगवान की लीला
हिमालय की गोद में नेपाल के मुक्तिनाथ क्षेत्र से निकलकर भारत में प्रवेश करने वाली गंडकी नदी को वैष्णव परंपरा में अत्यंत पवित्र माना गया है। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, ये वही नदी है जहां तुलसी के शाप से भगवान विष्णु पत्थर के रूप में निवास करते हैं। गंडकी के किनारे और जल में मिलने वाली गोलाकार काली शिलाएं कोई साधारण पत्थर नहीं, बल्कि शालिग्राम कहलाती हैं, जिनमें चक्र, शंख, गदा जैसे चिह्न स्वतः ही उभर आते हैं।
तुलसी और विष्णु की प्रेम कथा
पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, वृंदा नाम की एक पतिव्रता स्त्री थीं, जिनका पति जलंधर था। जलंधर की शक्ति का रहस्य था उसकी पत्नी की पतिव्रत धर्म। भगवान विष्णु ने छल से वृंदा का सतीत्व भंग किया ताकि जलंधर का वध हो सके। जब वृंदा को सत्य पता चला, उन्होंने क्रोधित होकर भगवान विष्णु को पत्थर बनने का शाप दे दिया।
भगवान विष्णु ने शाप को सहर्ष स्वीकार किया और कहा कि मैं गंडकी नदी में शिला रूप में निवास करूंगा और तुम तुलसी बनकर मेरे साथ रहोगी। तभी से गंडकी में शालिग्राम और उसके किनारे तुलसी का पौधा दोनों एक साथ पूजे जाते हैं।
देवउठनी एकादशी का विशेष महत्व
देवउठनी एकादशी के दिन शालिग्राम की विशेष पूजा का विधान है। इस दिन घर में शालिग्राम स्थापित कर तुलसी के साथ विवाह कराया जाता है, जिसे तुलसी-शालिग्राम विवाह कहते हैं। मान्यता है कि इस पूजा से वैवाहिक सुख, संतान प्राप्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
घर में शालिग्राम रखने से भगवान विष्णु स्वयं निवास करते हैं और परिवार पर उनकी कृपा बनी रहती है। लेकिन शालिग्राम की पूजा में कुछ विशेष नियम हैं। शालिग्राम को कभी अकेले नहीं रखा जाता, उसके साथ तुलसी जरूरी है। साथ ही, शालिग्राम को स्नान कराने के बाद चंदन, फूल, तुलसी पत्र और मिठाई अर्पित की जाती है।
गंडकी नदी का वैज्ञानिक रहस्य भी है आश्चर्यजनक
धार्मिक महत्व के साथ-साथ गंडकी नदी में शालिग्राम का बनना वैज्ञानिक दृष्टि से भी रोचक है। नदी में पाए जाने वाले जीवाश्म (अमोनाइट) ही समय के साथ खनिजीकृत होकर शालिग्राम का रूप लेते हैं। इनमें स्वाभाविक रूप से चक्र जैसे निशान बन जाते हैं, जो प्रकृति की अद्भुत कारीगरी हैं।
कैसे करें शालिग्राम की पहचान?
सभी शिलाएं शालिग्राम नहीं होतीं। असली शालिग्राम में निम्नलिखित विशेषताएं होती हैं। ये गोलाकार और चिकनी होती है। इसमें स्वर्ण या रजत के समान चमक होती है। चक्र, शंख, गदा या पद्म जैसे चिह्न स्पष्ट दिखाई देते हैं। यो भारी और ठंडी होती है।
जाली शालिग्राम से सावधान रहें। बाजार में कृत्रिम शिलाएं भी बेची जाती हैं। असली शालिग्राम केवल गंडकी नदी से ही प्राप्त होते हैं।
जीवंत स्वरूप है शालिग्राम
देवउठनी एकादशी का पर्व हमें याद दिलाता है कि भगवान हर रूप में हमारे बीच हैं, चाहे वो तुलसी का पत्ता हो या गंडकी का पत्थर। शालिग्राम पूजा न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि प्रेम, त्याग और शाप-विमोचन की पावन कथा भी है।
इस देवउठनी एकादशी पर अपने घर में शालिग्राम-तुलसी का विवाह कराएं, भगवान विष्णु को जगाएं और उनके आशीर्वाद से जीवन को धन्य बनाएं।
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