पिछले कुछ दिनों से रसोई गैस की किल्लत और सप्लाई चेन में आई बाधाओं के बीच भारत के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर आई है। सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) में फंसे भारतीय गैस जहाजों को ईरान ने आगे बढ़ने का रास्ता दे दिया है। यह सफलता भारत की उस धारदार कूटनीति का परिणाम है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सीधे ईरानी नेतृत्व से संवाद साधा था।
लाखों सिलेंडरों का कोटा है रास्ते में
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने एलपीजी से भरे दो भारतीय जहाजों को सुरक्षा के साथ निकलने की अनुमति दी है। एक अनुमान के मुताबिक:
एक टैंकर में 10,000 से 45,000 मीट्रिक टन एलपीजी होती है।
इस खेप से लगभग 10 लाख से 31 लाख घरेलू सिलेंडर भरे जा सकते हैं।
इसके साथ ही, सऊदी अरब से कच्चा तेल लेकर आ रहा एक टैंकर भी शनिवार तक भारत पहुँचने की उम्मीद है।
ईरान का रुख: दोस्ती और भविष्य की उम्मीद
नई दिल्ली में ईरान के राजदूत मोहम्मद फथाली का बयान भारत की बढ़ती वैश्विक साख की पुष्टि करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत ईरान का ‘पुराना दोस्त’ है और इस क्षेत्र में दोनों के हित साझा हैं। ईरान ने न केवल रास्ता दिया, बल्कि युद्ध की स्थिति समाप्त होने के बाद भारत से अपने पुनर्निर्माण में मदद की भी अपेक्षा जताई है।
भारत हमारा मित्र है। हमें उम्मीद है कि संकट के बाद भारत सरकार ईरान के पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।” — मोहम्मद फथाली, ईरानी राजदूत
मिशन मोड में भारत सरकार
होर्मुज क्षेत्र में फंसे 24 हजार भारतीयों और 677 नाविकों की सुरक्षा सरकार के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता रही है। इसे सुनिश्चित करने के लिए दिल्ली में हलचल तेज थी:
एस. जयशंकर: भारतीय विदेश मंत्री ने अपने ईरानी समकक्ष से चार बार टेलीफोन पर विस्तार से चर्चा की।
पीएम मोदी: प्रधानमंत्री ने स्वयं ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजेश्कियान से बात कर भारतीय हितों और नागरिकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया।
अमेरिकी छूट: इस बीच अमेरिका ने तेल की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए भारत सहित अन्य देशों को रूस से तेल खरीदने की छूट 11 अप्रैल तक बढ़ा दी है, जो वैश्विक बाजार में स्थिरता लाने के लिए एक बड़ा कदम है।
यह घटनाक्रम दर्शाता है कि भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद, भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) को बनाए रखने में सक्षम है। एलपीजी जहाजों का आना केवल रसोई गैस की आपूर्ति सुनिश्चित नहीं करेगा, बल्कि यह बाजार में कीमतों को उछलने से रोकने में भी मददगार साबित होगा।
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