महाराष्ट्र में शिक्षा का ‘संकट’: महाराष्ट्र, जिसे देश का अग्रणी शैक्षिक केंद्र माना जाता है, वहां से प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को लेकर एक डराने वाली रिपोर्ट सामने आई है। ‘यूनीफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फार्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस’ (UDISE+ 2024-25) के ताजा आंकड़ों ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, बीते पांच वर्षों में महाराष्ट्र ने अपने 850 सरकारी और 886 निजी स्कूलों को खो दिया है।
आंकड़ों की जुबानी: सिमटता शिक्षा का दायरा
संसद में डॉ. जॉन ब्रिटास द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में जारी इस रिपोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्कूल बंद होने का यह सिलसिला केवल सरकारी क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि निजी क्षेत्र भी इसकी चपेट में है।
राष्ट्रीय परिदृश्य: पूरे देश में ‘तालाबंदी’
महाराष्ट्र की यह स्थिति एक बड़े राष्ट्रीय संकट का हिस्सा है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में पूरे भारत में कुल 18,787 सरकारी स्कूल बंद हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों के एकीकरण (Merger) की नीति और कम नामांकन (Low Enrolment) इसके पीछे मुख्य कारण हो सकते हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इसका सीधा असर गरीब बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है।
स्कूल बंद होने के संभावित कारण और प्रभाव
- स्कूलों का विलय: सरकार अक्सर कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को नजदीकी बड़े स्कूलों में मिला देती है, जिससे कागजों पर स्कूल कम हो जाते हैं।
- बुनियादी ढांचे का अभाव: सरकारी स्कूलों में सुविधाओं की कमी के कारण अभिभावकों का मोहभंग होना।
- आर्थिक दबाव: निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल (Private Unaided) फंड की कमी और कड़े नियमों के कारण बंद हो रहे हैं।
- पहुंच की समस्या: स्कूल बंद होने से ग्रामीण और दुर्गम इलाकों के बच्चों को लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है, जिससे ‘ड्रॉप-आउट’ दर बढ़ने का खतरा है।
‘चिंता का विषय’
शिक्षाविदों का कहना है कि जहां एक ओर हम ‘शिक्षा के अधिकार’ (RTE) की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर स्कूलों की संख्या में यह गिरावट विरोधाभासी है। विशेषकर 850 सरकारी स्कूलों का बंद होना समाज के उस तबके के लिए बड़ा झटका है जो निजी स्कूलों की महंगी फीस वहन नहीं कर सकता।
आंकड़े केवल संख्या नहीं हैं, ये उन हजारों बच्चों का भविष्य हैं जिनका स्कूल अब उनके गांव या मोहल्ले में नहीं रहा।”































