विदेश से डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी कर लौटे सैकड़ों मेधावी छात्रों के सामने आज अपनी ही मिट्टी पर ‘प्रैक्टिस’ करने का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। महाराष्ट्र में ऐसे 430 डॉक्टर हैं, जिन्होंने चीन और अन्य देशों की यूनिवर्सिटी से एमबीबीएस (MBBS) की डिग्री तो हासिल कर ली है, लेकिन महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल (MMC) से लाइसेंस न मिल पाने के कारण वे कानूनी रूप से मरीजों का इलाज नहीं कर पा रहे हैं। नतीजा यह है कि डॉक्टर बनने का सपना पूरा होने के बाद भी ये युवा आज रोजगार के लिए दर-दर भटक रहे हैं।
कड़ी परीक्षा पास की, फिर भी ‘अयोग्य’!
विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट्स के लिए भारत में प्रैक्टिस करने का रास्ता आसान नहीं होता। उन्हें नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन (NBE) द्वारा आयोजित फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्जामिनेशन (FMGE) पास करना अनिवार्य होता है।
इस संकट का सामना कर रहीं डॉ. रचिता दिनेश कुर्मी की कहानी इन 430 डॉक्टरों की पीड़ा को दर्शाती है। चीन से एमबीबीएस करने वाली डॉ. रचिता ने:
* जनवरी 2026 में कठिन एफएमजीई परीक्षा पास की।
* नियमों के अनुसार एक साल की इंटर्नशिप भी सफलतापूर्वक पूरी की।
इतनी अर्हताओं के बावजूद, महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल ने उन्हें अब तक स्थाई पंजीकरण (Permanent Registration) नहीं दिया है।
रोजगार का संकट और प्रशासनिक पेच
रजिस्ट्रेशन न मिलने का मतलब है कि ये डॉक्टर न तो सरकारी अस्पतालों में नौकरी कर सकते हैं और न ही अपना क्लिनिक खोल सकते हैं।
* नाशिक से लेकर मुंबई तक: यह समस्या केवल मुंबई तक सीमित नहीं है, नाशिक और राज्य के अन्य हिस्सों के ग्रेजुएट्स भी इसी तकनीकी और प्रशासनिक देरी का शिकार हैं।
* मानसिक और आर्थिक दबाव: विदेशों में लाखों रुपये खर्च कर पढ़ाई करने के बाद अब खाली बैठना इन डॉक्टरों और उनके परिवारों के लिए आर्थिक और मानसिक तनाव का कारण बन रहा है।
MMC की चुप्पी पर सवाल
डॉक्टरों का आरोप है कि एमएमसी की ओर से लाइसेंस प्रक्रिया में जानबूझकर देरी की जा रही है या फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। जब छात्र एफएमजीई पास कर चुके हैं और इंटर्नशिप का अनुभव भी ले चुके हैं, तो पंजीकरण रोकने का कोई स्पष्ट आधार नजर नहीं आता।
एक ओर देश और प्रदेश में डॉक्टरों की भारी कमी की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर तैयार और योग्य डॉक्टरों को सिस्टम की सुस्ती के कारण घर बैठने पर मजबूर किया जा रहा है। यदि इन 430 डॉक्टरों को जल्द ही एमएमसी से लाइसेंस नहीं मिला, तो यह न केवल उनके करियर के साथ अन्याय होगा, बल्कि राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी एक बड़ी क्षति होगी।






























