महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और शिवसेना प्रमुख एकनाथ शिंदे आज 9 फरवरी को अपना जन्मदिन मना रहे हैं। 1964 में सतारा जिले के एक साधारण परिवार में जन्मे शिंदे की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। गरीबी, संघर्ष, मेहनत और राजनीति की ऊंचाइयों तक पहुंचने का उनका सफर आज भी लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बना हुआ है।
जब हालात ने पढ़ाई छीन ली
एकनाथ शिंदे का बचपन आर्थिक तंगी में बीता। परिवार की हालत ऐसी थी कि पढ़ाई जारी रखना मुश्किल हो गया। मजबूरी में उन्हें कम उम्र में ही काम करना पड़ा। घर चलाने के लिए उन्होंने ऑटो रिक्शा चलाया।
शिंदे कई बार कह चुके हैं कि ऑटो चलाने के दिनों ने उन्हें सिखाया कि कोई भी काम छोटा नहीं होता। ईमानदारी और मेहनत से किया गया हर काम इंसान को आगे बढ़ने की ताकत देता है।
सामाजिक सेवा से राजनीति तक
1980 के दशक में जब वे किशोरावस्था में थे, तब ठाणे में शिवसेना के वरिष्ठ नेता आनंद दीघे का प्रभाव था। आनंद दीघे को शिंदे अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं। उन्होंने सामाजिक कार्यों से राजनीति में कदम रखा।
गणेश उत्सव के आयोजन से लेकर पार्टी के हर प्रदर्शन और आंदोलन में सक्रिय भागीदारी ने उन्हें संगठन में पहचान दिलाई। बाला साहेब ठाकरे और आनंद दीघे का मार्गदर्शन उनके राजनीतिक जीवन की मजबूत नींव बना।
पहला चुनाव और बढ़ता कद
1997 में शिंदे को पहली बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारी मिली, जब उन्हें ठाणे नगर निगम चुनाव में शिवसेना का उम्मीदवार बनाया गया। उन्होंने भारी मतों से जीत दर्ज की और नगर निगम में अपनी पहचान मजबूत की।
2001 में उन्हें विपक्ष के नेता की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके बाद 2004 में उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा और ठाणे से विधायक बने। ये उनके राजनीतिक करियर का अहम मोड़ था।
मंत्री पद से मुख्यमंत्री तक
विधानसभा में सक्रिय भूमिका के चलते शिंदे का कद लगातार बढ़ता गया। 2014 में वे नेता प्रतिपक्ष बने और बाद में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन सरकार में मंत्री भी रहे।
राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब शिवसेना में अंदरूनी असंतोष और सत्ता संघर्ष ने बगावत का रूप लिया। एकनाथ शिंदे ने कई विधायकों के साथ अलग राह चुनी। इस घटनाक्रम के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा उलटफेर हुआ और शिंदे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
सत्ता परिवर्तन और नई भूमिका
बीजेपी के साथ मिलकर सरकार गठन के बाद देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद के लिए एकनाथ शिंदे के नाम की घोषणा की, जिसने राजनीतिक गलियारों में सबको चौंका दिया। बाद में गठबंधन की नई संरचना में शिंदे को उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई।
संघर्ष से मिली पहचान
एकनाथ शिंदे की कहानी केवल राजनीतिक उतार-चढ़ाव की नहीं, बल्कि संघर्ष, समर्पण और संगठन के प्रति निष्ठा की भी है। ऑटो रिक्शा चालक से लेकर राज्य के सर्वोच्च पद तक पहुंचना उनके धैर्य और दृढ़ निश्चय का परिणाम है।
उनकी यात्रा ये साबित करती है कि हालात चाहे जैसे हों, अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत सच्ची हो, तो रास्ते खुद बनते चले जाते हैं।
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