भारत के आंतरिक सुरक्षा इतिहास में आज का दिन स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को लोकसभा में एक ऐतिहासिक घोषणा करते हुए देश को ‘नक्सलवाद से मुक्त’ घोषित कर दिया है। गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ छिड़ी जंग अब अपने निर्णायक मुकाम पर पहुंच चुकी है और औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी होते ही इसकी विस्तृत जानकारी राष्ट्र को समर्पित की जाएगी।
डेडलाइन से पहले लक्ष्य हासिल
गौरतलब है कि 24 अगस्त 2024 को अमित शाह ने देश से नक्सलवाद के पूर्ण सफाये के लिए 31 मार्च 2026 की समय सीमा (डेडलाइन) तय की थी। इस निर्धारित तिथि से ठीक एक दिन पहले सदन को संबोधित करते हुए उन्होंने बताया कि सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के कारण नक्सलियों का ढांचा पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। गृह मंत्री ने सदन में आंकड़े पेश करते हुए बताया कि इस अभियान के दौरान 706 नक्सली मारे गए, 4839 ने आत्मसमर्पण किया और 2218 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तार और मारे गए नक्सलियों में लगभग सभी बड़े और इनामी कैडर शामिल हैं।
हथियार नहीं, संविधान में है समाधान
सदन में ‘वामपंथी उग्रवाद से मुक्ति के प्रयासों’ पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए अमित शाह ने कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा, “अब हथियार उठाने वालों को इसकी भारी कीमत चुकानी होगी। किसी भी अन्याय का समाधान हथियार में नहीं, बल्कि देश के संविधान में निहित है।” उन्होंने उग्रवाद की राह पर चलने वालों को मुख्यधारा में लौटने की चेतावनी देते हुए स्पष्ट किया कि हिंसा के लिए अब भारत में कोई स्थान नहीं है।
कांग्रेस पर तीखा हमला: आदिवासियों की अनदेखी का आरोप
चर्चा के दौरान गृह मंत्री ने कांग्रेस पार्टी पर आदिवासियों के पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद 60 साल तक सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस ने आदिवासी क्षेत्रों की सुध नहीं ली। आदिवासियों को न तो घर मिले, न स्वच्छ पानी, न स्कूल और न ही बैंकिंग सुविधाएं दी गईं। शाह ने आरोप लगाया कि इसी अनदेखी के कारण उग्रवाद को पनपने का मौका मिला, लेकिन वर्तमान सरकार ने विकास और सुरक्षा के दोहरे प्रहार से इसे जड़ से खत्म कर दिया है।
विकास और सुरक्षा का नया दौर
गृह मंत्री ने विश्वास दिलाया कि नक्सल प्रभावित रहे क्षेत्रों में अब शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे का जाल बिछाया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य इन क्षेत्रों के युवाओं को तकनीक और प्रगति से जोड़ना है ताकि वे फिर कभी भटककर हिंसा की राह न चुनें। इस घोषणा के साथ ही छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों के घने जंगलों में दशकों से चल रहे खूनी संघर्ष के अंत की आधिकारिक शुरुआत हो गई है।




























