देश में बढ़ती महंगाई और एलपीजी गैस की किल्लत ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। विशेष रूप से मेहनतकश और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए अब दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना भी एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। गैस की कमी और इसकी कालाबाजारी के कारण न केवल घरेलू बजट बिगड़ा है, बल्कि छोटे भोजन केंद्रों (रोटी-सब्जी केंद्र) पर भी इसका सीधा असर देखने को मिल रहा है।
साधारण थाली अब पहुंच से बाहर
गैस सिलेंडरों की कमी और बढ़ती कीमतों की सबसे अधिक मार छोटे भोजनालयों पर पड़ी है। जो साधारण भोजन की थाली कुछ समय पहले तक 70-80 रुपए में उपलब्ध थी, उसकी कीमत अब बढ़कर 90-110 रुपए के स्तर तक पहुंच गई है। अनाज की कीमतों में उछाल का असर यह है कि 8 रुपए में मिलने वाली पूरी अब 10 से 12 रुपए में मिल रही है, जबकि एक भाकरी की कीमत 25 रुपए तक जा पहुंची है।
होटल उद्योग पर संकट के बादल
कमर्शियल गैस सिलेंडरों की किल्लत और ग्रेवी में इस्तेमाल होने वाले प्याज-टमाटर जैसे आवश्यक मसालों और सब्जियों के दाम बढ़ने से होटलों में सब्जियों की कीमतों में औसतन 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। सब्जी मंडियों में कीमतों में आए तेज उछाल ने छोटे और मध्यम श्रेणी के होटलों के मुनाफे को कम कर दिया है, जिसका सीधा बोझ अब ग्राहकों की जेब पर डाला जा रहा है।
परिवहन खर्च ने बढ़ाई मुश्किलें
महंगाई की इस आग में घी डालने का काम डीजल की कीमतों ने किया है। डीजल के दामों में वृद्धि के संकेतों के बीच परिवहनकर्ताओं (ट्रांसपोर्टर्स) ने अपने किराए में 10 से 15 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर दी है। माल ढुलाई महंगी होने के कारण बाजार में आने वाली हर वस्तु की लागत बढ़ गई है, जिससे आने वाले दिनों में महंगाई और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
आम जनता में आक्रोश
लगातार बढ़ते खर्चों और आय के सीमित साधनों के बीच मध्यम वर्ग पूरी तरह पिस रहा है। नागरिकों का कहना है कि सरकार को गैस की कालाबाजारी पर लगाम लगानी चाहिए और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए कड़े कदम उठाने चाहिए, ताकि आम आदमी को कुछ राहत मिल सके।






























