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10 रुपये का खाना या चुनावी जुमला? BMC चुनाव से पहले बड़े वादों की असली सच्चाई

BMC चुनाव
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मुंबई में BMC चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे राजनीतिक दलों के वादों की फेहरिस्त भी लंबी होती जा रही है। इस बार चुनावी बहस के केंद्र में सबसे ज्यादा चर्चा 10 रुपये में भोजन जैसी योजनाओं की है। सवाल ये है कि क्या ये आम जनता को राहत देने वाली वास्तविक योजना है या फिर सिर्फ वोट बटोरने का चुनावी जुमला?

मुंबई देश का सबसे महंगा शहर माना जाता है, जहां एक वक्त का साधारण भोजन भी कई लोगों के बजट से बाहर हो जाता है। ऐसे में 10 रुपये में नाश्ता और खाना देने का वादा सीधे तौर पर शहरी गरीब, दिहाड़ी मजदूरों, झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोगों और कामकाजी वर्ग को आकर्षित करता है। राजनीतिक दल अच्छी तरह जानते हैं कि महंगाई से जूझ रही जनता के लिए भोजन सबसे संवेदनशील मुद्दा है।

कितना आसान होगा योजना को लागू करना?
हालांकि इस तरह की योजनाओं का इतिहास देखा जाए तो कई राज्यों और नगर निकायों में सस्ती भोजन योजनाएं पहले भी शुरू की गई हैं। कुछ जगहों पर ये योजनाएं सफल रहीं, तो कहीं बजट की कमी, भ्रष्टाचार और अव्यवस्था के कारण धीरे-धीरे बंद हो गईं। ऐसे में बीएमसी जैसे विशाल और खर्चीले नगर निगम में इस योजना को लागू करना आसान नहीं होगा। सवाल उठता है कि इसका आर्थिक बोझ कौन उठाएगा और क्या नगर निगम के पास इसके लिए स्थायी संसाधन मौजूद हैं।

BMC देश का सबसे अमीर नगर निगम है, लेकिन उस पर पहले से ही बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, सफाई, जल आपूर्ति और परिवहन से जुड़े भारी खर्च हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऐसी योजनाओं के लिए ठोस वित्तीय रोडमैप नहीं बनाया गया, तो ये सिर्फ कागजों तक सीमित रह सकती हैं। चुनावी घोषणाओं में योजना का जिक्र तो होता है, लेकिन क्रियान्वयन की स्पष्ट तस्वीर अक्सर गायब रहती है।

गरीबों मतदाताओं को लुभाते हैं ये वादे!
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो 10 रुपये में भोजन जैसी घोषणाएं सीधे भावनात्मक अपील करती हैं। मतदाता ये महसूस करता है कि सरकार उसकी रोजमर्रा की जरूरतों को समझ रही है। यही वजह है कि हर चुनाव में इस तरह के लोकलुभावन वादे सामने आते हैं। लेकिन चुनाव बीतते ही प्राथमिकताएं बदल जाती हैं और योजनाएं फाइलों में दबकर रह जाती हैं, ये आरोप अक्सर लगाए जाते रहे हैं।

मुंबई के मतदाता अब पहले की तुलना में ज्यादा जागरूक हैं। वे सिर्फ वादों से नहीं, बल्कि उनके पीछे की नीयत और क्षमता से भी जवाब चाहते हैं। सवाल ये भी है कि क्या सस्ता खाना देने के साथ-साथ रोजगार, स्वास्थ्य और आवास जैसी मूल समस्याओं का भी समान रूप से समाधान किया जाएगा या नहीं।

BMC चुनाव सिर्फ नगर निगम चुनने का चुनाव नहीं है, बल्कि ये तय करता है कि आने वाले वर्षों में मुंबई किस दिशा में आगे बढ़ेगी। ऐसे में मतदाताओं के सामने असली चुनौती यही है कि वे चुनावी नारों और वास्तविक नीतियों के बीच फर्क समझें। 10 रुपये का खाना राहत बन सकता है, लेकिन अगर ये सिर्फ चुनाव तक सीमित रहा, तो इसे जनता एक और चुनावी जुमले के तौर पर ही याद रखेगी।

अब फैसला जनता के हाथ में है कि वो बड़े वादों से प्रभावित होकर वोट देती है या उनकी सच्चाई और टिकाऊपन पर सवाल उठाती है।

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