Kamala Mills Case: बॉम्बे हाई कोर्ट ने कमला मिल्स के मालिक रमेश घमनीराम गोवानी के खिलाफ धोखाधड़ी के मामले में एक सख्त कदम उठाया है। यह मामला तब सुर्खियों में आया जब कोर्ट ने आर्थिक अपराध शाखा (EOW) की सुस्ती पर नाराजगी जताई और जांच को क्राइम ब्रांच को सौंपने का आदेश दिया। यह खबर नई पीढ़ी के लिए इसलिए खास है, क्योंकि यह दिखाती है कि कानून कितना शक्तिशाली हो सकता है, अगर उसे सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए।
कहानी की शुरुआत होती है आशुतोष हेमंत जोशी नाम के एक शख्स से, जो अपने पिता के हक के लिए लड़ रहे हैं। उनके पिता एक डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स सलाहकार थे, जिन्होंने गोवानी की कंपनी के साथ 2013 में एक समझौता किया था। इस समझौते के तहत उनके पिता को 20 करोड़ रुपये से ज्यादा की सलाहकार फीस मिलनी थी। इसके बदले में उन्हें सात फ्लैट देने का वादा भी किया गया था। लेकिन जोशी का दावा है कि न तो पैसा मिला और न ही फ्लैट। उल्टा, गोवानी ने उन फ्लैट्स को किसी और को बेच दिया। यह सुनकर किसी का भी गुस्सा भड़क सकता है, क्योंकि मेहनत का हक छिनना कोई छोटी बात नहीं होती।
आशुतोष ने 2018 में EOW में शिकायत दर्ज की। शुरू में जांच शुरू हुई, लेकिन फिर अचानक सब ठंडे बस्ते में चला गया। पिछले साल अगस्त में सरकार के वकील ने कोर्ट को बताया कि एक प्रारंभिक जांच हुई थी, लेकिन सितंबर आते-आते पुलिस ने कहा कि यह मामला गैर-संज्ञेय अपराध का है और इसे बंद कर दिया जाए। यह सुनकर बॉम्बे हाई कोर्ट के जजों, रेवती मोहिते-डेरे और नीला के. गोखले, को हैरानी हुई। उन्हें लगा कि EOW ने गोवानी के हल्के-फुल्के जवाबों को सच मान लिया और गहराई से जांच करने की जहमत नहीं उठाई। कोर्ट ने इसे “धोखाधड़ी” (cheating) और “सच्चाई को छिपाने की कोशिश” करार दिया।
जांच में कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं। गोवानी की कंपनी, ओर्रा रियल्टर्स, के पार्टनर रवि भंडारी ने समझौते पर दस्तखत किए थे। लेकिन गोवानी का कहना था कि ऐसा कोई समझौता हुआ ही नहीं। EOW ने यह भी पाया कि कंपनी के सभी पार्टनर इस्तीफा दे चुके थे और दो नए डायरेक्टर बनाए गए थे—जो हैरानी की बात है, कंपनी के चपरासी और ड्राइवर थे। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि गोवानी और उनके परिवार ने खुद को जिम्मेदारी से हटाने की साजिश रची। यह सुनकर लगता है कि यह कोई फिल्मी कहानी हो, लेकिन यह सच है और इसे गंभीरता से लेना जरूरी है।
कोर्ट ने EOW की निष्क्रियता पर सवाल उठाए। उसने कहा कि फ्लैट की खरीद-फरोख्त, भंडारी के दस्तखत, नए डायरेक्टर्स की नियुक्ति और यह दावा कि जोशी के पिता को कोई भुगतान नहीं हुआ—इन सबकी गहराई से जांच होनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि अगर जांच सही तरीके से नहीं हुई, तो लोगों का कानून पर भरोसा टूट जाएगा। इसलिए, 18 मार्च को कोर्ट ने क्राइम ब्रांच को यह जिम्मेदारी दी कि वह आठ हफ्तों में पूरी जांच करे और रिपोर्ट पेश करे। अगली सुनवाई 9 जून को होगी, और तब तक सबकी नजरें इस मामले पर टिकी रहेंगी।
यह मामला सिर्फ एक शख्स की लड़ाई नहीं है। यह दिखाता है कि जब सिस्टम में खामियां होती हैं, तो उसे ठीक करने की ताकत कानून के पास होती है। नई पीढ़ी के लिए यह एक सबक है कि अपने हक के लिए आवाज उठाना कितना जरूरी है। कमला मिल्स जैसे बड़े नामों का जिक्र होने से यह खबर और भी रोचक हो जाती है, क्योंकि यह जगह मुंबई की पहचान से जुड़ी है। अब क्राइम ब्रांच इस “धोखाधड़ी” (cheating) की गुत्थी को सुलझाने में कितनी मेहनत करती है, यह देखना बाकी है।