महाराष्ट्र के कई जिलों में तेंदुए का दिखना अब कोई दुर्लभ घटना नहीं रह गई है। पश्चिमी महाराष्ट्र से लेकर विदर्भ और मराठवाड़ा तक, गांवों, खेतों और शहरी इलाकों में तेंदुए की मौजूदगी ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। हाल के महीनों में पुणे, नासिक, सांगली, कोल्हापुर, चंद्रपुर और अमरावती जैसे जिलों से लगातार तेंदुआ दिखने की खबरें सामने आई हैं।
गन्ने के खेत बने तेंदुए का ठिकाना
ग्राउंड पर स्थिति देखें तो पश्चिमी महाराष्ट्र के गन्ना बेल्ट में तेंदुओं की मौजूदगी सबसे ज्यादा दर्ज की जा रही है। ऊंचे और घने गन्ने के खेत तेंदुए को छिपने के लिए आदर्श जगह देते हैं। कोल्हापुर जिले के एक किसान बताते हैं, “दिन में तेंदुआ दिखाई नहीं देता, लेकिन रात होते ही खेतों से गांव की तरफ निकल आता है।”
पुणे-नासिक बेल्ट में शहरी टकराव
पुणे और नासिक जैसे तेजी से फैलते शहरों में जंगल और कॉलोनियों की दूरी लगभग खत्म हो चुकी है। नए हाउसिंग प्रोजेक्ट, आईटी पार्क और हाईवे निर्माण ने तेंदुओं के पारंपरिक रास्तों को तोड़ दिया है। पुणे के बाहरी इलाके में रहने वाले एक स्थानीय निवासी कहते हैं, “तेंदुआ अब जंगल से नहीं, नाले के रास्ते कॉलोनी में आ जाता है।”
विदर्भ में जंगल पास, फिर भी आबादी में तेंदुआ
चंद्रपुर और गढ़चिरौली जैसे जिलों में बड़े जंगल होने के बावजूद तेंदुए गांवों के करीब देखे जा रहे हैं। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, इसकी एक वजह जंगल के भीतर शिकार की कमी और इंसानी गतिविधियों का बढ़ना है।
स्कूल बंद, खेतों में जाना मुश्किल
कई गांवों में तेंदुए की मौजूदगी के बाद स्कूलों के समय बदले गए हैं। सुबह-सुबह खेत जाने वाले किसान अब समूह में निकलने लगे हैं। बच्चों और बुजुर्गों को घर से बाहर निकलने में डर लग रहा है। एक महिला ने बताया, “सुबह पानी भरने जाना भी अब अकेले संभव नहीं रहा।”
वन विभाग की चुनौती
महाराष्ट्र वन विभाग की टीमें लगातार निगरानी कर रही हैं। पिंजरे लगाए जा रहे हैं, कैमरा ट्रैप और ड्रोन का इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन तेंदुए को पकड़ना आसान नहीं है। वन विभाग के एक अधिकारी कहते हैं, “तेंदुआ स्मार्ट जानवर है। हर बार दिखता नहीं, लेकिन आसपास मौजूद रहता है।”
कचरा और आवारा कुत्ते बड़ा कारण
ग्राउंड रिपोर्टिंग में ये भी सामने आया कि गांवों और कस्बों में खुले में कचरा और बढ़ती आवारा कुत्तों की संख्या तेंदुए को आकर्षित कर रही है। कुत्तों का पीछा करते हुए तेंदुआ रिहायशी इलाकों में पहुंच जाता है।
हमला कम, डर ज्यादा
आंकड़े बताते हैं कि महाराष्ट्र में तेंदुए के हमले अपेक्षाकृत कम हैं। ज्यादातर घटनाएं तब होती हैं जब तेंदुआ अचानक सामने आ जाए या घिर जाए। बावजूद इसके, डर का माहौल बना रहता है।
समाधान क्या हो सकता है?
स्थानीय विशेषज्ञ और वन अधिकारी मानते हैं कि, गन्ने के खेतों के आसपास सतर्कता बढ़ानी होगी। कचरा प्रबंधन सुधारना होगा। वन्यजीव कॉरिडोर सुरक्षित रखने होंगे और लोगों को जागरूक करना होगा कि तेंदुआ दिखे तो भीड़ न लगाएं।
महाराष्ट्र की जमीनी हकीकत ये है कि तेंदुए और इंसानों की सीमाएं अब टकरा रही हैं। ये सिर्फ वन्यजीव समस्या नहीं, बल्कि विकास और पर्यावरण संतुलन से जुड़ा सवाल है। जब तक जंगल, खेत और शहर के बीच संतुलन नहीं बनेगा, तेंदुए की ये दस्तक यूं ही सुनाई देती रहेगी।
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