Maharashtra Budget Session 2026: लोकतंत्र के मंदिर में जनता के मुद्दों को उठाने के लिए आवंटित ‘प्रश्नकाल’ (Question Hour) इन दिनों समय की बर्बादी की भेंट चढ़ रहा है। महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने सदन में विधायकों के व्यवहार और लंबी-चौड़ी भूमिकाओं पर लगातार दूसरे दिन गहरी नाराजगी व्यक्त की है। बुधवार को उन्होंने विधायकों को स्पष्ट नसीहत दी कि यदि सदन की उत्पादकता बढ़ानी है, तो उन्हें अपनी बात संक्षिप्त और सटीक रखनी होगी।
चार मिनट का सवाल और अध्यक्ष की टोक
बुधवार को प्रश्नकाल के दौरान एक सदस्य द्वारा लगभग चार मिनट लंबा सवाल पूछे जाने पर अध्यक्ष नार्वेकर ने उन्हें बीच में ही टोका। उन्होंने टिप्पणी की, “मैंने मंगलवार को भी स्पष्ट किया था कि सवाल छोटे, स्पष्ट और सटीक होने चाहिए। लंबी भूमिका बांधने से सदन का बहुमूल्य समय बर्बाद होता है। अगर सदस्य कम समय लेंगे, तो हम अधिक से अधिक जनहित के मुद्दों पर चर्चा कर सकेंगे।”
प्रश्नकाल का कड़वा गणित: 50 में से सिर्फ 8 सवाल
विधानसभा की कार्य-पत्रिका (Agenda) और वास्तविक चर्चा के बीच का अंतर चौंकाने वाला है। अध्यक्ष ने आंकड़ों के जरिए सदन को आईना दिखाया:
| विवरण | स्थिति |
|---|---|
| प्रश्नकाल की अवधि | कुल 1 घंटा (60 मिनट) |
| सूचीबद्ध प्रश्न | 30 से 50 के बीच |
| वास्तविक चर्चा | मात्र 6 से 8 सवाल |
अध्यक्ष का कहना है कि लंबी भाषणबाजी के कारण 40 से अधिक महत्वपूर्ण सवाल बिना चर्चा के ही रह जाते हैं। इससे उन निर्वाचन क्षेत्रों के मुद्दों को न्याय नहीं मिल पाता जिनके सवाल सूची में पीछे रह जाते हैं।
मंत्री का समर्थन: “सवाल बड़ा, जवाब छोटा”
अध्यक्ष की इस नसीहत का सरकार की ओर से गृह राज्य मंत्री (शहर) योगेश कदम ने भी पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने एक दिलचस्प पहलू सामने रखते हुए कहा कि कभी-कभी सदस्य इतनी लंबी भूमिका बांधते हैं कि उनका सवाल चार मिनट का होता है, जबकि सरकार का जवाब महज कुछ सेकंड का।
कदम ने कहा, “अध्यक्ष महोदय की सलाह एकदम सही है। अगर सवाल संक्षिप्त होंगे, तो हम ज्यादा से ज्यादा सदस्यों को जवाब देकर उनके क्षेत्र की समस्याओं का समाधान कर सकेंगे।”
समय प्रबंधन क्यों है जरूरी?
- समान अवसर: सदन में हर सदस्य को अपने क्षेत्र की आवाज उठाने का मौका मिले।
- संसदीय मर्यादा: प्रश्नकाल का उद्देश्य जानकारी प्राप्त करना है, न कि राजनीतिक भाषण देना।
- जनहित: कम समय में अधिक विषयों पर चर्चा होने से सरकार की जवाबदेही तय होती है।
विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर का यह कड़ा रुख विधायी कामकाज में सुधार लाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। अब यह विधायकों पर निर्भर करता है कि वे ‘सटीक सवाल’ पूछकर सदन की गरिमा और समय का सम्मान कैसे करते हैं।































