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Maharashtra Health Crisis: महाराष्ट्र में ‘बीमार’ हुई स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रति लाख आबादी पर अब सिर्फ 65 बेड

Maharashtra Health Crisis
Maharashtra Health Crisis

Maharashtra Health Crisis: देश की आर्थिक राजधानी और सबसे विकसित राज्यों में शुमार महाराष्ट्र इस समय एक गंभीर स्वास्थ्य संकट के मुहाने पर खड़ा है। राज्य की नवीनतम आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि पिछले तीन दशकों में राज्य की आबादी तो तेजी से बढ़ी, लेकिन सार्वजनिक अस्पतालों में बेड (बिस्तरों) की संख्या बढ़ने के बजाय कम होती गई। यह गिरावट तब और भी चिंताजनक हो जाती है जब राज्य मलेरिया, डेंगू, टीबी और एचआईवी जैसी संक्रामक बीमारियों से जूझ रहा है।

तीन दशक का डरावना आंकड़ा: 144 से गिरकर 65 पर पहुंचे बेड
आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 1991 में महाराष्ट्र के सरकारी और स्थानीय निकाय अस्पतालों में प्रति एक लाख आबादी पर 144 बेड उपलब्ध थे। लेकिन 2025 तक आते-आते यह औसत घटकर मात्र 65 बेड रह गया है। यानी पिछले 34 वर्षों में प्रति लाख आबादी पर 79 बेड कम हो गए हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि स्वास्थ्य ढांचे का विस्तार जनसंख्या वृद्धि की दर से मेल नहीं खा पा रहा है।

बेड्स की संख्या में भारी गिरावट (1991 बनाम 2025)
रिपोर्ट के मुताबिक, केवल अनुपात ही नहीं बल्कि बेड की कुल संख्या में भी भारी कमी आई है:

  • वर्ष 1991: कुल बेड की संख्या 1,09,267 थी।
  • वर्ष 2025: यह संख्या गिरकर 84,432 रह गई है।
  • कुल गिरावट: पिछले तीन दशकों में बेड्स की उपलब्धता में 23 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।

उतार-चढ़ाव का दौर: 2020 के बाद आया बड़ा संकट
स्वास्थ्य सेवाओं के आंकड़ों में पिछला दशक काफी अस्थिर रहा है। 2011 में बेड की संख्या 1,18,116 थी, जो 2020 तक बढ़कर 1,27,943 तक पहुंच गई थी। लेकिन इसके बाद आंकड़ों में भारी गिरावट देखी गई:

  • 2021: संख्या गिरकर 75,893 रह गई।
  • 2024: कुछ सुधार के साथ आंकड़ा 93,407 पर पहुंचा।
  • 2025: एक बार फिर गिरावट आई और आंकड़ा 84,432 पर सिमट गया।

इन आंकड़ों में केवल सरकारी, स्थानीय निकाय (नगर पालिका/मनपा) और ट्रस्ट के अस्पतालों को शामिल किया गया है। इसमें निजी अस्पतालों के बेड शामिल नहीं हैं।

चिंता के मुख्य कारण: क्यों बढ़ रहा है दबाव?

  • संक्रामक रोगों का हमला: राज्य में टीबी, एचआईवी और मौसमी बीमारियों (डेंगू, मलेरिया) का लोड बढ़ रहा है, जिसके लिए लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने की जरूरत होती है।
  • ट्रस्ट अस्पतालों की भूमिका: रिपोर्ट में बताया गया है कि 1971 से 2020 तक ट्रस्ट अस्पतालों को शामिल किया गया था, लेकिन हाल के वर्षों में इनके प्रबंधन या डेटा रिपोर्टिंग में बदलाव ने भी संख्या को प्रभावित किया है।
  • बढ़ता शहरीकरण: मुंबई, पुणे और नागपुर जैसे शहरों में बढ़ती भीड़ ने मौजूदा सरकारी अस्पतालों के संसाधनों पर भारी दबाव डाला है।

जानकारों की राय: “खतरे की घंटी”
स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति की विफलता को दर्शाती है। यदि प्रति लाख आबादी पर बेड की संख्या इसी तरह घटती रही, तो किसी भी आपातकालीन स्थिति (जैसे भविष्य की महामारी) में राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा सकती है। आम आदमी के लिए निजी अस्पतालों का खर्च उठाना संभव नहीं है, ऐसे में सरकारी बेड्स की कमी सीधे तौर पर गरीबों की जीवन प्रत्याशा को प्रभावित कर रही है।

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