महाराष्ट्र की राजनीति में सोमवार का दिन ऐतिहासिक रहा। विधानसभा ने लंबे विमर्श और तीखी नोकझोंक के बीच ‘महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026’ को ध्वनि मत से पारित कर दिया। करीब 6 घंटे तक चली इस मैराथन चर्चा ने सदन के भीतर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच की वैचारिक दरारों को एक बार फिर सतह पर ला दिया।
मुख्यमंत्री का रुख: ‘निशाना धर्म नहीं, मंशा सुरक्षा’
विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बेहद सधे हुए अंदाज में सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस कानून का उद्देश्य किसी विशेष समुदाय या धर्म को लक्षित करना कतई नहीं है।
मुख्यमंत्री ने सदन को आश्वस्त करते हुए कहा:
यह विधेयक झूठे बहकावे, प्रलोभन या दबाव के माध्यम से किए जाने वाले अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए लाया गया है। हम किसी की आस्था के विरुद्ध नहीं हैं, बल्कि उस जबरदस्ती के खिलाफ हैं जो व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा को दबाती है।
उन्होंने संवैधानिक मर्यादाओं का हवाला देते हुए अनुच्छेद 25 का जिक्र किया, जो हर नागरिक को अपनी पसंद का धर्म चुनने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता देता है। साथ ही, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों को भी ढाल बनाया जिनमें कहा गया है कि राज्य सरकारें धर्मांतरण को विनियमित करने के लिए कानून बनाने हेतु अधिकृत हैं।
सदन का विभाजन: शिवसेना (यूबीटी) का चौंकाने वाला समर्थन
इस विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्षी खेमे में दिलचस्प बिखराव देखने को मिला। एक ओर जहाँ शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने हिंदुत्व के मुद्दे पर सरकार के इस कदम का समर्थन किया, वहीं दूसरी ओर महाविकास अघाड़ी के अन्य सहयोगी दलों ने इसका कड़ा विरोध किया।
समर्थन में: शिवसेना (यूबीटी) ने वैचारिक आधार पर विधेयक का पक्ष लिया।
विरोध में: कांग्रेस, राकांपा (शरद पवार गुट) और समाजवादी पार्टी ने इसे ‘विभाजनकारी’ करार देते हुए सदन से वाकआउट की कोशिश की। विपक्ष का तर्क था कि यह कानून व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप कर सकता है।
विधेयक की मुख्य विशेषताएं (संभावित)
अवैध धर्मांतरण पर रोक: शादी या नौकरी के झूठे वादे कर धर्म परिवर्तन कराने पर सख्त सजा।
दबाव और प्रलोभन: किसी भी प्रकार के आर्थिक या सामाजिक दबाव को अपराध की श्रेणी में लाना।
पारदर्शिता: धर्मांतरण से पहले जिला प्रशासन को सूचित करने जैसे प्रावधान।
2026 के चुनावी साल (या उसके निकट) में इस विधेयक का पारित होना महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा मोड़ है। जहाँ सरकार इसे सामाजिक सुरक्षा और संवैधानिक अधिकार बता रही है, वहीं विपक्ष इसे चुनावी ध्रुवीकरण की कोशिश करार दे रहा है। हालांकि, ध्वनि मत से इसके पारित होने ने सरकार की विधायी मजबूती को सिद्ध कर दिया है।
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