महाराष्ट्र

संसद में गूंजी महाराष्ट्र की चीख: लापता महिलाओं और बच्चियों के आंकड़ों ने दहलाया, राज्यसभा में उठी ‘ठोस कार्रवाई’ की मांग

महाराष्ट्र
Image Source - Web

महाराष्ट्र में महिलाओं और नाबालिग लड़कियों के लापता होने का सिलसिला अब एक ‘भयावह संकट’ का रूप ले चुका है। मंगलवार को संसद के उच्च सदन, राज्यसभा में भाजपा सांसद डॉ. मेधा कुलकर्णी ने इस मुद्दे को पूरी प्रखरता से उठाया। शून्यकाल (Zero Hour) के दौरान उन्होंने महाराष्ट्र के गृह विभाग के चौंकाने वाले आंकड़े पेश करते हुए केंद्र और राज्य सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित किया।

आंकड़ों की जुबानी: एक गहराती खाई
डॉ. मेधा कुलकर्णी ने बताया कि वर्ष 2024 और 2025 के दौरान राज्य में महिलाओं के गायब होने की दर में अप्रत्याशित वृद्धि देखी गई है। हालांकि अंतिम आंकड़ों का संकलन जारी है, लेकिन गृह विभाग के हवाले से जो संकेत मिले हैं, वे डराने वाले हैं।

* नाबालिग लड़कियां निशाने पर: लापता होने वालों में एक बड़ा हिस्सा उन नाबालिग लड़कियों का है, जिनका पता लगाने में पुलिस प्रशासन को भारी मशक्कत करनी पड़ रही है।
* भयावह रूप: सांसद ने सदन में स्पष्ट रूप से कहा कि यह केवल गुमशुदगी के मामले नहीं हैं, बल्कि इसके पीछे कोई संगठित अपराध या मानव तस्करी (Human Trafficking) का जाल होने की भी आशंका है।

संसद में उठी तीन प्रमुख मांगें
डॉ. कुलकर्णी ने अपनी बात रखते हुए सरकार से तत्काल निम्नलिखित कदम उठाने का आग्रह किया:
* स्पेशल टास्क फोर्स (STF): लापता महिलाओं और बच्चियों के मामलों की जांच के लिए हर जिले में एक समर्पित टीम बनाई जाए।
* डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम: लापता लोगों के डेटा को रियल-टाइम में अपडेट करने और अंतर-राज्यीय समन्वय (Inter-state coordination) को मजबूत करने की आवश्यकता है।
* जागरूकता अभियान: ग्रामीण और शहरी इलाकों में ‘सुरक्षा और सतर्कता’ को लेकर बड़े पैमाने पर अभियान चलाया जाए।

चुनौती और चिंता के मुख्य बिंदु
महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य में इन आंकड़ों का बढ़ना कई सवाल खड़े करता है:
* मानव तस्करी का खतरा: क्या लापता हो रही लड़कियां किसी बड़े रैकेट का शिकार हो रही हैं?
* सोशल मीडिया का दुरुपयोग: कई मामलों में देखा गया है कि सोशल मीडिया के जरिए दोस्ती और फिर बहला-फुसलाकर ले जाने की घटनाएं बढ़ी हैं।
* पुलिस की भूमिका: सांसद ने पुलिस प्रशासन को और अधिक संवेदनशील और सक्रिय बनाने पर जोर दिया ताकि ‘गोल्डन ऑवर’ (गायब होने के शुरुआती घंटों) में ही कार्रवाई हो सके।

सुरक्षा अब प्राथमिकता
संसद में इस मुद्दे का उठना यह दर्शाता है कि अब इसे केवल ‘गुमशुदगी’ की फाइलों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। महाराष्ट्र सरकार और गृह विभाग पर अब यह दबाव होगा कि वे इन दो वर्षों (2024-2025) के आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण करें और दोषियों के खिलाफ कड़े कदम उठाएं।

डॉ. मेधा कुलकर्णी का बयान: “जब तक हमारी बेटियां और महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं, तब तक विकास के सारे आंकड़े बेमानी हैं। हमें इस समस्या की जड़ तक जाना होगा।”

ये भी पढ़ें: बस्तर में नक्सलवाद का अंत करीब: 25 लाख के इनामी ‘पापा राव’ समेत 18 खूंखार नक्सलियों का आत्मसमर्पण

You may also like