महाराष्ट्र के भिवंडी शहर की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। नगर निगम के मेयर चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को करारा झटका लगा, जब पार्टी के बागी नेता नारायण चौधरी ने कांग्रेस के समर्थन से मेयर पद पर जीत दर्ज की। इस घटनाक्रम ने स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है।
कैसे बदला पूरा खेल?
भिवंडी नगर निगम में मेयर पद के चुनाव को लेकर पहले से ही राजनीतिक हलचल तेज थी। बीजेपी ने अपने आधिकारिक उम्मीदवार को मैदान में उतारा था, लेकिन पार्टी के भीतर असंतोष की खबरें सामने आ रही थीं। इसी बीच बीजेपी के बागी नेता नारायण चौधरी ने अलग राह अपनाते हुए चुनाव लड़ने का फैसला किया।
चुनाव के दौरान कांग्रेस ने रणनीतिक चाल चलते हुए नारायण चौधरी को समर्थन देने का निर्णय लिया। वोटिंग के बाद नतीजे आए तो चौधरी ने बहुमत हासिल कर लिया और मेयर पद पर काबिज हो गए। इस अप्रत्याशित परिणाम से बीजेपी खेमे में निराशा और असंतोष का माहौल देखा गया।
बीजेपी को क्यों लगा झटका?
भिवंडी नगर निगम में बीजेपी अपनी स्थिति मजबूत मान रही थी। पार्टी नेतृत्व को उम्मीद थी कि मेयर पद पर उसका उम्मीदवार आसानी से जीत दर्ज करेगा। लेकिन आंतरिक गुटबाजी और बगावत ने पार्टी की रणनीति पर पानी फेर दिया।
नारायण चौधरी की जीत ने ये साफ कर दिया कि स्थानीय स्तर पर पार्टी संगठन में मतभेद गहरे हैं। कांग्रेस के समर्थन ने इस समीकरण को और भी जटिल बना दिया।
कांग्रेस की रणनीति सफल
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, कांग्रेस ने इस मौके का फायदा उठाते हुए बीजेपी के भीतर की नाराजगी को भुनाया। सीधे मुकाबले के बजाय बागी उम्मीदवार का समर्थन कर कांग्रेस ने सत्ता समीकरण में अपनी भूमिका मजबूत की है। इससे नगर निगम की आगामी नीतियों और फैसलों पर भी असर पड़ सकता है।
आगे क्या?
भिवंडी की राजनीति में ये बदलाव आने वाले समय में और बड़े राजनीतिक समीकरणों को जन्म दे सकता है। बीजेपी के लिए ये आत्ममंथन का समय है, जबकि कांग्रेस के लिए ये रणनीतिक जीत मानी जा रही है।
मेयर पद पर नारायण चौधरी के कार्यकाल की शुरुआत अब कई चुनौतियों के साथ होगी। शहर के विकास कार्य, बुनियादी सुविधाएं और राजनीतिक स्थिरता – इन सभी मुद्दों पर अब नई नेतृत्व क्षमता की परीक्षा होगी।
भिवंडी में हुए इस सियासी “खेला” ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि स्थानीय राजनीति में आखिरी वक्त तक कुछ भी संभव है।
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