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मकर संक्रांति पर शहर बनाम गांव: कैसे बदलती है जश्न की रंगत?

मकर संक्रांति
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मकर संक्रांति का त्योहार सिर्फ सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश का प्रतीक नहीं है, बल्कि ये हर साल नए उत्साह, रंग और परंपराओं के साथ पूरे देश में मनाया जाता है। लेकिन जब हम इस जश्न को शहरों और गांवों में देखेंगे, तो ये साफ़ दिखाई देता है कि परंपरा और आधुनिकता के मिश्रण ने इसे हर जगह अलग रंग दे दिया है।

शहरों में मकर संक्रांति: चमक, चकाचौंध और आधुनिक उत्सव

शहरों में मकर संक्रांति का जश्न अक्सर भीड़-भाड़ और रफ्तार के साथ चलता है। मुंबई, दिल्ली, जयपुर और अहमदाबाद जैसी महानगरियों में लोग अपने छतों और खुले स्थानों पर पतंगों की उड़ान का आनंद लेते हैं। यहां पतंगों की रंगीन दुनिया, इंस्टाग्राम और फेसबुक पर लाइव वीडियो, और दोस्तों के साथ छोटे-छोटे प्रतियोगिताएं त्योहार की पहचान बन गई हैं।

व्यापार भी इस मौके पर अपनी रौनक दिखाता है। पतंगों के बाजार, तिल-गुड़ के स्टॉल और मूंगफली विक्रेता हर कोने में दिखते हैं। शहर के लोग इस अवसर को पारिवारिक मिलन और सोशल मीडिया ट्रेंड दोनों के लिए इस्तेमाल करते हैं। सुरक्षा को लेकर भी यहां जागरूकता ज्यादा होती है; हेलमेट पहनना, छतों की सुरक्षा और पतंग उड़ाने के नियमों का पालन शहर के उत्सव में अहम भूमिका निभाते हैं।

गांवों में मकर संक्रांति: मिट्टी, परंपरा और सामुदायिक मेलजोल

वहीं गांवों में मकर संक्रांति का जश्न पूरी तरह से जीवन और परंपरा से जुड़ा होता है। खेतों और खुले मैदानों में लोग तिल-गुड़, मूंगफली और हलवा तैयार करते हैं। गांव में ये समय परिवार और समुदाय के मेलजोल का होता है। लोग एक-दूसरे के घर जाकर शुभकामनाएं देते हैं, और ये त्योहार गांव की संस्कृति और साझेदारी को जीवित रखता है।

पतंग उड़ाने का आनंद भी गांवों में अनोखा होता है। यहां बच्चों से लेकर बुज़ुर्ग तक खुले आकाश में पतंगों को उड़ाते हैं, और हर पतंग प्रतियोगिता में पूरी उत्साह के साथ हिस्सा लेते हैं। शहर के मुकाबले गांवों में ये उत्सव अधिक प्राकृतिक और सामूहिक अनुभव होता है, जहां सोशल मीडिया की चमक कम और व्यक्तिगत जुड़ाव ज्यादा होता है।

शहर और गांव: उत्सव के दो पहलू

इस तुलना में स्पष्ट है कि शहर में मकर संक्रांति अधिक व्यक्तिगत, आधुनिक और डिजिटल-संवादी बन गई है, जबकि गांवों में ये सामुदायिक, पारंपरिक और प्रकृति के करीब है। शहरों में सुरक्षा और सुविधा के साथ जश्न मनाया जाता है, वहीं गांवों में मिट्टी, धूप, हलवे की खुशबू और खेतों की पृष्ठभूमि त्योहार को जीवंत बनाती है।

इस तरह, मकर संक्रांति सिर्फ उत्तरायण का प्रतीक नहीं रह गया, बल्कि ये सामाजिक और सांस्कृतिक बदलावों का दर्पण भी बन गया है। शहर और गांव दोनों अपनी शैली में इसे मनाते हैं, लेकिन भावना, उल्लास और उत्सव की रौनक हर जगह बराबर रहती है।

अंततः ये त्योहार ये याद दिलाता है कि चाहे शहर हो या गांव, परंपरा और खुशी का जश्न हमेशा जीवित रहेगा, बस उसे मनाने का अंदाज़ बदल गया है।

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