Mental health: आज की भागदौड़ भरी दुनिया में, हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ ‘कनेक्टिविटी’ तो बढ़ गई है, लेकिन ‘कनेक्शन’ कम होता जा रहा है। सुबह उठते ही सबसे पहले स्मार्टफोन की स्क्रीन देखना और रात को उसी के साथ सो जाना हमारी नियति बन चुकी है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि यह निरंतर डिजिटल शोर हमारे मस्तिष्क और हमारी मानसिक शांति पर क्या प्रभाव डाल रहा है?
सोशल मीडिया: दिखावे की दुनिया और तुलना का ज़हर
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर दूसरों की ‘परफेक्ट’ जिंदगी को देखना हमें अनजाने में ही हीन भावना का शिकार बना रहा है। लोग अपनी खुशियाँ तो साझा करते हैं, लेकिन संघर्षों को छिपा लेते हैं। इसे देखकर हम अक्सर अपनी वास्तविक जिंदगी की तुलना दूसरों की ‘रील’ लाइफ से करने लगते हैं, जिससे तनाव और एंग्जायटी (घबराहट) पैदा होती है।
‘फोमो’ (FOMO) का बढ़ता प्रकोप
Fear Of Missing Out (FOMO) यानी कुछ छूट जाने का डर। हर पल अपडेट रहने की चाहत ने हमें बेचैन कर दिया है। अगर कोई नोटिफिकेशन न आए या हम किसी ट्रेंड का हिस्सा न बनें, तो हमें अकेलापन महसूस होने लगता है। यह डर हमें वर्तमान क्षण का आनंद लेने से रोकता है।
नींद की चोरी और चिड़चिड़ापन
स्मार्टफोन से निकलने वाली नीली रोशनी (Blue Light) हमारे शरीर में ‘मेलाटोनिन’ हार्मोन के स्तर को कम कर देती है, जो नींद के लिए जिम्मेदार है। अधूरी नींद न केवल शारीरिक थकान लाती है, बल्कि मानसिक रूप से भी हमें चिड़चिड़ा और एकाग्रता में कमजोर बनाती है।
समाधान: डिजिटल डिटॉक्स और आत्म-संवाद
अगर समस्या डिजिटल है, तो समाधान भी हमारे विवेक में ही छिपा है। हमें अपनी तकनीक के साथ रिश्तों को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है।
- डिजिटल डिटॉक्स: सप्ताह में कम से कम एक दिन या दिन के कुछ घंटे ‘नो फोन जोन’ घोषित करें। प्रकृति के साथ समय बिताएं।
- सचेत उपयोग (Mindful Usage): सोशल मीडिया का उपयोग केवल सूचना या मनोरंजन के लिए करें, न कि दूसरों से अपनी तुलना करने के लिए। अनचाहे नोटिफिकेशन्स को बंद कर दें।
- शारीरिक सक्रियता: योग और व्यायाम न केवल शरीर को फिट रखते हैं, बल्कि मस्तिष्क में ‘डोपामाइन’ और ‘सेरोटोनिन’ जैसे हैप्पी हार्मोन्स को भी बढ़ाते हैं।
- मदद मांगने में संकोच न करें: यदि तनाव हावी होने लगे, तो किसी मित्र, परिवार के सदस्य या पेशेवर परामर्शदाता (Counselor) से बात करें। मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बात करना कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी है।
तकनीक हमारा दास होनी चाहिए, स्वामी नहीं। डिजिटल युग की अपनी खूबियाँ हैं, लेकिन अपनी मानसिक शांति की कीमत पर इन्हें अपनाना एक घाटे का सौदा है। याद रखें, वास्तविक जीवन स्क्रीन के बाहर है, जहाँ असली रिश्ते और असली मुस्कुराहटें आपका इंतजार कर रही हैं।




























