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Mumbai Underworld 2.0: ‘अदृश्य’ शूटर और तकनीक का खौफ, क्या बिश्नोई गैंग के आगे बेबस हो रही है खाकी?

Mumbai Underworld 2.0
Mumbai Underworld 2.0

Mumbai Underworld 2.0: मायानगरी में संगठित अपराध का स्वरूप अब पूरी तरह बदल चुका है। कभी दाऊद और छोटा राजन के गैंगवार से थर्राने वाली मुंबई के सामने अब लॉरेंस बिश्नोई गैंग एक ऐसी पहेली बनकर उभरा है, जिसे सुलझाने में पुलिस के पारंपरिक तरीके नाकाम साबित हो रहे हैं।

यह नया अंडरवर्ल्ड न केवल डिजिटल रूप से चालाक है, बल्कि इसका ढांचा इतना बिखरा हुआ है कि ‘मास्टरमाइंड’ तक पहुँचना एक बड़ी चुनौती बन गया है।

तकनीक और ‘एन्क्रिप्टेड’ अपराध का जाल
मुंबई पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, बिश्नोई गैंग अब पुराने जमाने के गुर्गों की तरह फोन कॉल नहीं करता। अब खेल VOIP (वॉयस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल), एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स और सोशल मीडिया के जरिए खेला जा रहा है।

  • पहचान छिपाना आसान: हर धमकी के लिए अलग डिवाइस और बार-बार बदलती लोकेशन पुलिस के सर्विलांस सिस्टम को गच्चा दे रही है।
  • डिजिटल फुटप्रिंट का अभाव: अपराधी तकनीक का इस्तेमाल कर अपने पीछे कोई ठोस सबूत नहीं छोड़ रहे हैं।

‘अनजान चेहरे’: बिश्नोई की सबसे घातक रणनीति
पुराने अंडरवर्ल्ड के पास ‘रिकॉर्डेड अपराधी’ होते थे, जिनकी कुंडली पुलिस फाइलों में दर्ज होती थी। लेकिन बिश्नोई गैंग की रणनीति इसके उलट है:

  • फ्रेश टैलेंट: गैंग ऐसे युवकों को चुन रहा है जिनका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।
  • सोशल मीडिया से भर्ती: गैंगस्टर संस्कृति और ग्लैमर से प्रभावित होकर युवक मामूली रकम के लिए हथियार उठाने को तैयार हो जाते हैं।
  • पहचान का संकट: जब हमलावर का कोई रिकॉर्ड ही नहीं होता, तो वारदात के बाद उसे पकड़ना और कड़ी जोड़ना नामुमकिन जैसा हो जाता है।

‘मौन’ का साम्राज्य: खौफ के साये में पीड़ित
जांच में सबसे बड़ी बाधा ‘डर’ बनकर उभरी है। हाई-प्रोफाइल हस्तियों को धमकियां तो मिल रही हैं, लेकिन वे पुलिस के पास जाने से कतरा रहे हैं।

जब तक औपचारिक शिकायत नहीं मिलती, हमारे हाथ बंधे होते हैं। बिना गवाह और पुष्टि के हम वसूली (Extortion) के मामलों को अदालत में साबित नहीं कर सकते।” — वरिष्ठ पुलिस अधिकारी

केस स्टडी: रोहित शेट्टी फायरिंग और ‘मैकेनिक’ का नकाब
फिल्म निर्देशक रोहित शेट्टी के घर हुई फायरिंग ने इस गैंग की पैठ का खुलासा किया है। गिरफ्तार आरोपी आसाराम फासले इसका जीता-जागता उदाहरण है:

  • वह पिछले 4 साल से एक साधारण गैरेज मैकेनिक की आड़ में काम कर रहा था।
  • वह बाबा सिद्दीकी हत्याकांड के मास्टरमाइंड शुभम लोनकर के प्रभाव में था।
  • एक साधारण मैकेनिक का हथियार सप्लायर बन जाना यह दर्शाता है कि यह गैंग समाज के सामान्य वर्गों में किस कदर अपनी जड़ें जमा चुका है।

चुनौती बड़ी है
मुंबई पुलिस के लिए अब चुनौती सिर्फ कानून-व्यवस्था की नहीं, बल्कि ‘अदृश्य दुश्मन’ से लड़ने की है। जब तक तकनीक और सूचना तंत्र को और अधिक उन्नत नहीं किया जाता, तब तक बिश्नोई गैंग जैसे आधुनिक सिंडिकेट को जड़ से उखाड़ना एक टेढ़ी खीर बना रहेगा।

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