देश के सबसे विकसित औद्योगिक क्षेत्रों में शुमार ठाणे-बेलापुर (TTC) इंडस्ट्रियल बेल्ट में इन दिनों विकास और विस्थापन के बीच एक बड़ी जंग छिड़ गई है। महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (MIDC) द्वारा 338 एकड़ अतिक्रमित जमीन पर प्रस्तावित झोपड़पट्टी पुनर्वास योजना (SRA) और क्लस्टर प्रोजेक्ट अब आंकड़ों के जाल में उलझ गया है। पात्रता की शर्तों और सर्वे के नतीजों ने हजारों परिवारों के भविष्य पर तलवार लटका दी है।
आंकड़ों का ‘मायाजाल’: हकीकत बनाम एमआईडीसी सर्वे
विवाद की मुख्य जड़ झोपड़ियों की गिनती और पात्रता को लेकर है। मनपा (NMMC) के विकास योजना और एमआईडीसी के आंकड़ों के बीच एक बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है:
* 2001 का आंकड़ा: मनपा के रिकॉर्ड के अनुसार तब 48,805 झोपड़े थे।
* 2011 का आंकड़ा: यह संख्या बढ़कर 67,327 हो गई।
* एमआईडीसी की पात्रता: चौंकाने वाली बात यह है कि एमआईडीसी ने पुनर्वास के लिए केवल 38,800 झोपड़ियों को ही पात्र माना है।
नतीजा: यदि एमआईडीसी के इन आंकड़ों को अंतिम माना जाता है, तो करीब 28,527 परिवार इस योजना से बाहर हो जाएंगे। इसका सीधा मतलब है कि हजारों लोग बेघर हो सकते हैं, जो दशकों से इस औद्योगिक क्षेत्र के विकास में श्रमिक के रूप में योगदान दे रहे हैं।
टीटीसी बेल्ट: विकास की चमक के पीछे का अंधेरा
नवी मुंबई का टीटीसी इंडस्ट्रियल एरिया आज देश के सबसे विकसित औद्योगिक क्षेत्रों में से एक है। यहाँ बड़ी आईटी कंपनियाँ, डेटा सेंटर और विनिर्माण इकाइयाँ स्थित हैं। लेकिन इसी चमक-धमक के बीच 338 एकड़ जमीन पर बसी झोपड़पट्टियाँ यहाँ के श्रमिकों का आशियाना हैं। सरकार यहाँ ‘क्लस्टर डेवलपमेंट’ के जरिए जमीनों को खाली कराकर व्यवस्थित पुनर्वास करना चाहती है, लेकिन ‘अपात्रता’ के डर ने झोपड़ाधारकों को सड़क पर उतरने को मजबूर कर दिया है।
उग्र आंदोलन की तैयारी: “घर नहीं तो विकास नहीं”
पात्रता सूची से बाहर होने के डर ने स्थानीय निवासियों और श्रमिक संगठनों को एकजुट कर दिया है। झोपड़ाधारकों का तर्क है कि वे 2011 से पहले से यहाँ रह रहे हैं और उनके पास पर्याप्त दस्तावेज हैं, फिर भी उन्हें सर्वे में बाहर क्यों रखा गया?
* आंदोलन की चेतावनी: विभिन्न स्थानीय संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि पात्रता की कट-ऑफ डेट और सर्वे में सुधार नहीं किया गया, तो वे काम बंद कर उग्र आंदोलन करेंगे।
* राजनीतिक मोड़: आगामी चुनावों को देखते हुए अब विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे पर अपनी रोटियां सेकना शुरू कर दिया है, जिससे मामला और भी संवेदनशील हो गया है।
क्या है समाधान?
जानकारों का मानना है कि इस विवाद को सुलझाने के लिए एमआईडीसी को मनपा के पुराने रिकॉर्ड्स और आधार डेटा का फिर से मिलान करना होगा। 28 हजार परिवारों को नजरअंदाज करना न केवल मानवीय दृष्टिकोण से गलत होगा, बल्कि यह नवी मुंबई की कानून-व्यवस्था के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
नवी मुंबई का टीटीसी क्षेत्र विकास की नई ऊंचाइयों को छूने को तैयार है, लेकिन यह विकास तभी सार्थक होगा जब इसमें उन लोगों का भी स्थान सुरक्षित हो जिन्होंने इस औद्योगिक बेल्ट को अपने पसीने से सींचा है। फिलहाल, 28 हजार परिवारों की निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।






























