मुंबई

मुंबई की ‘म्यूजिकल रोड’ पर रात का सन्नाटा: निवासियों की शिकायतों के बाद बीएमसी का बड़ा एक्शन, रात 10 से सुबह 6 बजे तक नो-एंट्री

म्यूजिकल रोड
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मुंबई: दक्षिण मुंबई का प्रतिष्ठित ब्रीच कैंडी इलाका, जो अपनी शांति और समंदर के किनारों के लिए जाना जाता है, पिछले कुछ समय से एक अनूठे ‘शोर’ के कारण चर्चा में था। यहाँ भारत की चुनिंदा ‘म्यूजिकल सड़कों’ में से एक बनाई गई थी, जिसका उद्देश्य सड़क सुरक्षा और नवाचार था। लेकिन अब स्थानीय निवासियों की नींद में खलल डालने के कारण बीएमसी ने इस पर रात के समय कड़ा प्रतिबंध लगा दिया है।

1. क्या है ‘म्यूजिकल रोड’ का विवाद?
म्यूजिकल रोड एक विशेष इंजीनियरिंग तकनीक है, जिसमें सड़क की सतह पर खास तरह की धारियां (Grooves) बनाई जाती हैं। जब गाड़ियां एक निश्चित गति से इन धारियों के ऊपर से गुजरती हैं, तो पहियों और सड़क के घर्षण से एक मधुर संगीत जैसी ध्वनि निकलती है।
ब्रीच कैंडी में इसे पर्यटकों और नवाचार के लिहाज से बनाया गया था, लेकिन जल्द ही यह वरदान की जगह निवासियों के लिए सिरदर्द बन गया। रात के शांत समय में गाड़ियों की आवाजाही से निकलने वाला संगीत ‘शोर’ (Noise Pollution) में बदल जाता था।

2. निवासियों और एएलएम की मुहिम
स्थानीय निवासियों का कहना था कि दिन भर तो ट्रैफिक का शोर रहता ही है, लेकिन रात के समय इस ‘म्यूजिकल’ प्रभाव के कारण वे चैन की नींद नहीं सो पा रहे थे।

* शिकायत: ब्रीच कैंडी की एएलएम (Advanced Locality Management) ने इस मुद्दे को उठाते हुए महाराष्ट्र सरकार और बीएमसी कमिश्नर को पत्र लिखा।
* तर्क: निवासियों का तर्क था कि यह तकनीक आवासीय क्षेत्र के बजाय राजमार्गों (Highways) पर अधिक प्रभावी होती है, जहाँ आबादी कम होती है।

3. बीएमसी का फैसला: रात में ‘बैरिकेडिंग’
शिकायतों की गंभीरता को देखते हुए बीएमसी प्रशासन ने बीच का रास्ता निकाला है।
* नया नियम: अब हर रात 10:00 बजे से सुबह 06:00 बजे तक इस म्यूजिकल रोड को बैरिकेड कर दिया जाएगा।
* असर: इस निर्धारित समय के दौरान सड़क पर वाहनों की आवाजाही पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगी, जिससे इलाके में शांति बनी रहे।

4. नवाचार बनाम स्थानीय शांति
यह मामला शहरी नियोजन (Urban Planning) में एक बड़ी बहस को जन्म देता है कि क्या रिहायशी इलाकों में इस तरह के प्रयोग किए जाने चाहिए? जानकारों का मानना है कि म्यूजिकल रोड का उद्देश्य ड्राइवरों को गति सीमा के प्रति सचेत करना होता है, लेकिन मुंबई जैसे घनी आबादी वाले शहर में यह निवासियों के ‘राइट टू साइलेंस’ (शांति के अधिकार) का उल्लंघन माना जाने लगा।

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