महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बयानबाज़ी तेज हो गई है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) प्रमुख राज ठाकरे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने हाल ही में आयोजित संघ के शताब्दी कार्यक्रम और उसमें दिए गए भाषण को लेकर सवाल उठाए हैं।
क्या कहा राज ठाकरे ने?
राज ठाकरे ने दावा किया कि कार्यक्रम में पहुंचे लोग किसी उत्साह या विचारों से प्रभावित होकर नहीं, बल्कि “डर” के माहौल में शामिल हुए थे। उनका कहना है कि अगर भाषण में लोगों की वास्तविक रुचि होती, तो उपस्थिति स्वाभाविक होती, न कि दबाव में।
उन्होंने ये भी संकेत दिया कि बड़े आयोजनों में भीड़ का होना हमेशा समर्थन का प्रतीक नहीं होता, बल्कि इसके पीछे अन्य कारण भी हो सकते हैं।
भाषाई पहचान पर उठाया मुद्दा
राज ठाकरे ने अपने बयान में भाषाई अस्मिता और मराठी पहचान का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र की भाषा और सांस्कृतिक पहचान पर किसी भी तरह की टिप्पणी को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। उनके अनुसार, क्षेत्रीय भाषाओं और स्थानीय पहचान का सम्मान किया जाना चाहिए, क्योंकि यही भारत की विविधता की ताकत है।
८ फेब्रुवारी २०२६ रोजी मुंबईतल्या एका कार्यक्रमात सरसंघचालक श्री. मोहन भागवत यांनी, भाषेबद्दल आग्रही राहणे, त्यासाठी वेळेस आंदोलन करणे हा एक आजार आहे अशा आशयाचं विधान केलं.
या कार्यक्रमाला विविध क्षेत्रातील मान्यवरांना बोलावण्यात आले होते, त्यातले काही हजर देखील होते ! परंतु…
— Raj Thackeray (@RajThackeray) February 10, 2026
राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज
राज ठाकरे के इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू हो गई है। समर्थकों का मानना है कि उन्होंने मराठी स्वाभिमान का मुद्दा उठाया है, जबकि आलोचकों का कहना है कि ये बयान राजनीतिक प्रतिक्रिया का हिस्सा है। हालांकि, RSS या मोहन भागवत की ओर से इस बयान पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
आगे क्या?
ये बयान ऐसे समय में आया है जब भाषा, संस्कृति और पहचान के मुद्दे राजनीतिक विमर्श का अहम हिस्सा बने हुए हैं। आने वाले दिनों में इस बयान पर और प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं। फिलहाल, राज ठाकरे की टिप्पणी ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
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