Ramadan 2026: रमजान का महीना इस्लाम धर्म में इबादत, संयम और आत्मशुद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस दौरान मुसलमान सूर्योदय से सूर्यास्त तक रोजा रखते हैं और शाम को इफ्तार के साथ रोजा खोलते हैं। आपने अक्सर देखा होगा कि इफ्तार की शुरुआत खजूर से की जाती है। लेकिन क्या ये केवल धार्मिक परंपरा है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण भी छिपा है? आइए विस्तार से समझते हैं।
धार्मिक परंपरा से जुड़ी मान्यता
इस्लामी परंपरा के अनुसार, पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब रोजा खोलते समय खजूर का सेवन करते थे। इसी सुन्नत का पालन करते हुए दुनियाभर के मुसलमान इफ्तार की शुरुआत खजूर से करते हैं। खजूर को पवित्र और बरकत वाला फल माना जाता है, इसलिए रमजान में इसका विशेष महत्व होता है।
लंबे उपवास के बाद शरीर को क्यों चाहिए खजूर?
रोजे के दौरान व्यक्ति करीब 12 से 15 घंटे तक बिना पानी और भोजन के रहता है। ऐसे में शरीर में ऊर्जा का स्तर कम हो जाता है और ब्लड शुगर गिर सकती है।
खजूर में प्राकृतिक शुगर (ग्लूकोज, फ्रुक्टोज और सुक्रोज) भरपूर मात्रा में होती है, जो शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करती है। यही कारण है कि इफ्तार की शुरुआत खजूर से करने पर थकान जल्दी दूर होती है।
खजूर के पोषण तत्व
खजूर केवल ऊर्जा ही नहीं देता, बल्कि कई आवश्यक पोषक तत्वों से भी भरपूर होता है:
फाइबर – पाचन तंत्र को बेहतर बनाए रखने में सहायक
पोटैशियम – हृदय और मांसपेशियों के लिए लाभकारी
मैग्नीशियम – हड्डियों की मजबूती के लिए जरूरी
आयरन – खून की कमी दूर करने में मददगार
एंटीऑक्सीडेंट – शरीर को फ्री रेडिकल्स से बचाने में सहायक
रोजा खोलते समय खजूर खाने से पाचन तंत्र धीरे-धीरे सक्रिय होता है, जिससे भारी भोजन करने पर अचानक दबाव नहीं पड़ता।
पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद
लंबे उपवास के बाद यदि सीधे भारी और तला-भुना भोजन खाया जाए तो पेट में गैस, एसिडिटी या अपच की समस्या हो सकती है। खजूर हल्का और आसानी से पचने वाला फल है, जो पेट को भोजन के लिए तैयार करता है।
इसीलिए विशेषज्ञ भी सलाह देते हैं कि उपवास तोड़ते समय हल्के और पोषक आहार से शुरुआत करनी चाहिए।
केवल परंपरा नहीं, सेहत का भी ख्याल
रमजान में खजूर से रोजा खोलना सिर्फ धार्मिक आस्था का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बेहद लाभकारी है। परंपरा और विज्ञान का यह सुंदर संगम सदियों से चला आ रहा है।
इसलिए जब भी आप इफ्तार में खजूर खाते हैं, तो समझ लीजिए कि ये सिर्फ रिवाज नहीं, बल्कि शरीर को संतुलित और स्वस्थ रखने की एक समझदारी भरी परंपरा है।
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