भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) $700 अरब के पार है, जो देश को दुनिया की सबसे सुरक्षित अर्थव्यवस्थाओं की कतार में खड़ा करता है। यह भंडार इतना विशाल है कि हम बिना किसी आय के 10 महीने तक अपना आयात (Import) जारी रख सकते हैं। इसके बावजूद, रुपया प्रति डॉलर ₹95 के स्तर को छू रहा है। आखिर इस
विरोधाभास के पीछे के वास्तविक कारण क्या हैं?
1. पेट्रोलियम कंपनियों की डॉलर ‘भूख’ और रुपये पर दबाव
भारतीय रुपये की कमजोरी में सबसे बड़ा हाथ पेट्रोलियम कंपनियों की डॉलर के प्रति बढ़ती मांग का है।
* भारी डिमांड: भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। इन कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से तेल खरीदने के लिए हर रोज अरबों डॉलर की जरूरत होती है।
* बाजार में असंतुलन: जब तेल कंपनियां खुले बाजार (Open Market) से एक साथ भारी मात्रा में डॉलर खरीदती हैं, तो डॉलर की मांग अचानक बढ़ जाती है और रुपया कमजोर होने लगता है।
* समाधान: ‘सेपरेट डॉलर विंडो’: एसबीआई की इकोरैप रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि तेल कंपनियों के लिए एक ‘अलग डॉलर विंडो’ बनाई जानी चाहिए।
* इसका मतलब है कि तेल कंपनियां सीधे आरबीआई (RBI) या किसी विशेष चैनल से डॉलर खरीदें, न कि सामान्य बाजार से।
* इससे बाजार में डॉलर की ‘वास्तविक’ डिमांड दिखेगी और सट्टेबाजी या अचानक आने वाले उछाल से रुपया सुरक्षित रहेगा।
2. बैंकिंग नियम: डॉलर की उपलब्धता में नई अड़चनें
आरबीआई के कुछ हालिया नियमों और बैंकिंग परिचालनों ने डॉलर की लिक्विडिटी (तरलता) को प्रभावित किया है।
* ब्याज दरों का अंतर: आरबीआई के नए नियमों के कारण घरेलू और विदेशी बाजारों में डॉलर की विनिमय दरों (Exchange Rates) का अंतर बढ़ गया है।
* उपलब्धता का संकट: नियमों की सख्ती के कारण बैंक अक्सर डॉलर को होल्ड करने या विदेशी बाजारों में लेन-देन करने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं। इससे स्थानीय बाजार में डॉलर की कमी हो जाती है और रुपया गिर जाता है।
* ग्लोबल अनिश्चितता: वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियों के कारण निवेशक डॉलर को ‘सुरक्षित संपत्ति’ मान रहे हैं, जिससे डॉलर वैश्विक स्तर पर मजबूत हो रहा है।
क्या रुपया फिर से संभलेगा?
इकोरैप रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि रुपये की कमजोरी भारत की आर्थिक कमजोरी की निशानी नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल मार्केट की अनिश्चितता और डॉलर की स्थानीय मांग का परिणाम है। यदि सरकार तेल कंपनियों के लिए अलग ‘विंडो’ खोलती है और बैंकिंग नियमों में डॉलर की आसान उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है, तो मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार के दम पर रुपया जल्द ही स्थिरता की ओर लौट सकता है।
मजबूत भंडार होने का अर्थ यह नहीं है कि केंद्रीय बैंक हर बार रुपये को गिरने से बचाएगा। कभी-कभी निर्यात को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए रुपये को बाजार के अनुसार ढलने देना भी एक सोची-समझी रणनीति होती है।
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