मिडिल ईस्ट एक बार फिर बारूद के ढेर पर खड़ा है। विशेषज्ञों की मानें तो स्थिति ‘हमले से ठीक पहले’ वाली बन चुकी है। अमेरिका ने ईरान को घेरने के लिए समुद्र से लेकर आसमान तक अपनी घेराबंदी पूरी कर ली है। अब केवल एक ‘राजनीतिक आदेश’ की प्रतीक्षा है, जिसके बाद कुछ ही घंटों के भीतर एक बड़ा सैन्य ऑपरेशन शुरू हो सकता है।
अमेरिका की घेराबंदी: समुद्र और आसमान से प्रहार की तैयारी
पेंटागन ने अपनी रणनीति को धार देते हुए क्षेत्र में सैन्य जमावड़ा चरम पर पहुँचा दिया है। वर्तमान सैन्य स्थिति को देखते हुए अमेरिका को अब किसी अतिरिक्त बल की आवश्यकता नहीं है।
- नौसैनिक शक्ति: अरब सागर और लाल सागर में यूएसएस अब्राहम लिंकन और यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट जैसे विमानवाहक पोत तैनात हैं। इनके साथ मिसाइल विध्वंसक युद्धपोतों का जत्था किसी भी रक्षा कवच को भेदने में सक्षम है।
- हवाई अड्डों की सक्रियता: कतर, बहरीन, सऊदी अरब, इराक और जॉर्डन के अमेरिकी सैन्य अड्डों पर लड़ाकू विमानों की आवाजाही और सतर्कता बढ़ गई है।
- संभावित लक्ष्य: रणनीतिकारों के अनुसार, यदि हमला होता है, तो अमेरिका का सीधा निशाना ईरान के परमाणु ठिकाने, सैन्य बेस और कमांड एंड कंट्रोल सेंटर होंगे।
ईरान का पलटवार: जून 2025 जैसी स्थिति का अंदेशा
ईरान ने भी पीछे न हटने के संकेत दिए हैं। तेहरान की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि यदि अमेरिका या इजराइल की ओर से कोई भी उकसावे वाली कार्रवाई होती है, तो उसका जवाब बेहद तीखा होगा। ईरान अपने मिसाइल और ड्रोन भंडार का उपयोग कर कतर स्थित अमेरिकी ठिकानों और इजराइल को निशाना बना सकता है, ठीक वैसी ही स्थिति जैसे जून 2025 के दौरान देखी गई थी।
कूटनीति की आखिरी उम्मीद: अंकारा में सुलह की कोशिश
जंग के बादलों के बीच शांति की एक क्षीण उम्मीद अभी भी बरकरार है। कूटनीतिक गलियारों में ‘ट्रैक-2’ वार्ताएं तेज हो गई हैं:
- अराघची का मिशन: ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची तुर्किये की राजधानी अंकारा पहुँच रहे हैं। उनका मुख्य उद्देश्य संभावित हमले को टालने के लिए बीच का रास्ता निकालना है।
- तुर्किये की मध्यस्थता: राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन इस संकट में ‘शांतिदूत’ की भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के बीच एक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग वार्ता का प्रस्ताव रखा है।
दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या एर्दोगन का ‘वीडियो वार्ता’ प्रस्ताव मेज पर स्वीकार किया जाता है या फिर हथियारों की गूंज कूटनीति की आवाज को दबा देगी। यदि बातचीत विफल रहती है, तो आने वाले कुछ घंटे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए विनाशकारी साबित हो सकते हैं।






























